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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 196
१८६कंब रामायण

(कुछ न दे सकने की) पीडा से भर जाओगी ? नही तो, क्या उन याचको से 'मेरे पास नही है' कह दोगी ? तुम कैसा जीवन व्यतीत करोगी ?

तुम क्या करने की बात सोचकर हर्ष से मुग्ध हुई थी ? भविष्य मे कभी तुम्हारे पिता, माता, कोई बन्धु या तुम्हारे कुल का कोई व्यक्ति अभाव-ग्रस्त होकर अपने अभाव को दूर करने के विचार से तुम्हारे पास आवेगा, तो क्या वह तुम्हारी सौत के ऐश्वर्य को देखकर चुप रह जायगा ? विचार करके देखो।

तुम पर प्रेम रखनेवाले तुम्हारे गरिमामय पति के डर से ही उस बिंवाधरा सीता का पिता तथा राम का ससुर, तुम्हारे पिता (केकय राजा) पर आक्रमण किये बिना रहता है। अब तुम्हारे पिता का जीवन समाप्त हो जायगा। हे अबोध ! तुम्हारे समान निंदनीय जन्मवाला और कौन है ?

और सुनो, यदि तुम्हारे पिता के कठोर शत्रु जब तुम्हारे पिता से युद्ध करने के लिए आयेगे, तब यदि कोशल देश की सेना उनकी सहायता न करेगी, तो उन्हे (तुम्हारे पिता को) विजय नामक वस्तु किस प्रकार मिलेगी ? यह बताओ। अहो, तुमने अपने बधुजनो का भी विनाश करनेवाले दुःख-समुद्र में डूबने का निश्चय कर लिया है ?

अपने उत्तम पुत्र को राज्य पाने से रोककर तुमने उसे मिटा दिया। उज्ज्वल समुद्र-रूपी वस्त्र से भूषित पृथ्वी को चक्रवर्त्ती ने अपने एक पुत्र को दिया, जो उसके प्रिय भाई का स्वत्व होगा। अन्य कौन उसपर अधिकार रख सकेगा ?—इस प्रकार मन्थरा ने कहा।

क्रूर मथरा के इन वचनो को सुनकर देवो की माया के कारण उन (देवो) के द्वारा प्राप्त वर के प्रभाव के कारण तथा मुनियो के तपःप्रभाव के कारण कैकेयी का सरल तथा निष्कलंक मन भी बदल गया।

राक्षसी के द्वारा कृत पापो तथा देवो के किये पुण्यो से प्रेरित होकर कैकेयी ने अपनी करुणा को त्याग दिया स्वच्छ वचनवाली तथा हरिणी-तुल्य कैकेयी की वह निष्ठुरता ही तो आज भी इस ससार के लोगो के, राम के अपार यशोमृत का पान करने का कारण बनी है ?

इस प्रकार (प्रभावित) होकर कैकेयी ने, पापकर्मों से पूर्ण कूबरी को प्रेम से देखकर कहा—तुम मुझपर प्रेम रखनेवाली और मेरे पुत्र का हित करनेवाली हो। मेरा पुत्र अलंकृत राज-किरीट को किस प्रकार प्राप्त करे, अब यह बताओ।

आम के टिकोरे के जैसे सुन्दर नयनोवाली (कैकेयी) की बात सुनकर मथरा बोली—मेरी सखी चतुर है, मेरी साथिन चतुर है। फिर (कैकेयी के) चरणो को नमस्कार करके कहा—अब तुम्हारी अवनति नही होगी। यदि तुम मेरी बात मानकर उसके अनुसार काम करोगी, तो मै सप्त लोको के राज्य पर भी तुम्हारे अनुपम पुत्र का स्वत्व बना दूँगी।

उस मंथरा ने जिसका मन भी (उसके शरीर के जैसे ही) टेढ़ा था, कहा—हे उज्ज्वल रत्न-समान देवी! मैं भली भाँति विचार कर तुम्हे एक बात बताती हूँ। पूर्वकाल