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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 195

अयोध्याकाण्ड १८५

जैसे जलती आग में घी पड़ा हो। उसकी रेखाओ से युक्त आँखे अधिक लाल हो गईं। मंथरा को देखकर उसने कहा —

आतपयुक्त सूर्य प्रभृति महान् पुरुष, प्राण जाने पर भी न्याय-मार्ग को नही छोड़ते। हे क्षुद्र स्वभाववाली ! मेरे कैकयवंश तथा (वैवस्वत) मनु के वंश को कलंकित करनेवाली कैसी क्षुद्र वात तूने कही ?

तू मेरा हित करनेवाली नही हैं। मेरे सुत भरत का भी हित करनेवाली नही है। धर्म का विचार करने पर (ज्ञात होता है कि) तू अपना भी हित करनेवाली नही है। हे विवेकहीन ! पूर्वजन्म के पाप-संस्कार के कारण तू ने (अपने) मन को अच्छी लगने-वाली बाते कही हैं।

जन्म और मृत्यु के कारण जो वस्तु प्राप्त होती है या खोती है, वह एकमात्र यश ही है। अतः, शरीर चाहे गिर जाय, न्याय अपने विरुद्ध हो जाय, सन्मार्ग का रूप अपने प्रतिकूल हो जाय, तपस्या का रूप विरुद्ध हो जाय तथा निष्कलंक पराक्रम भी विरुद्ध हो जाय, तो भी अपने कुल-धर्म को छोड़ना उचित नही है ।

तू मेरे सामने से हट जा। क्षुद्र वचन कहनेवाली तेरी जीभ को मैने काट नही लिया, पर तेरे इस अपराध को सह लिया, मेरे अतिरिक्त और कोई इस बात को सुन ले, तो तू अन्याय तथा अधर्म करने के अपराध का पात्र बन जायगी। अतः, हे बुद्धिहीन ! चुप रह ।

जिस प्रकार विष का उपचार करने पर भी वह विष न मिटकर पीडा ही उत्पन्न करे, उसी प्रकार मंथरा (कैकेयी के) वह वचन सुनकर भी भयभीत होकर हटी नही । किन्तु, यह कहती हुई कि हे मेरे अवलंब, मैं तुम्हे हितकारी वचन कहे बिना नही हटूंगी, उसके चरणो पर गिरकर फिर कहने लगी—

तुमने कहा—ज्येष्ठ के रहते हुए कनिष्ठ को राज्याधिकार नही होता। इस न्याय के अनुसार चक्रवर्त्ती के रहते हुए समुद्रवर्ण (राम) का राज्य पर कोई अधिकार नही है। जब चक्रवर्त्ती राम को राजमुकुट देने के लिए सन्नद्ध हुए हैं, तब वह सम्पत्ति भरत के लिए क्यो अप्राप्य हो सकती है ?

वैराग्यपूर्ण, करुणायुक्त तथा अपूर्व तपस्या से सम्पन्न मुनि भी क्यो न हो, दुर्लभ सम्पत्ति प्राप्त करने पर उनका विचार भी बदल जाता है। अतः, भले ही अबतक तुम्हारा कुछ अहित (कौशल्या और राम ने) नही किया हो, तथापि (सम्पत्ति पाने पर) वे अपने मन मे निरन्तर तुम्हारे अहित का ही चितन करते रहेंगे।

दूसरो की उन्नति पर ईर्ष्या करनेवाली कौशल्या का पुत्र जब राज करेगा, तब सारी पृथ्वी उसका स्वत्व बन जायगी। तब तुम्हारे पुत्र का तथा तुम्हारा इस पृथ्वी मे उस (कौशल्या) के दिये गये पदाथों के अतिरिक्त और कुछ अधिकार नही रहेगा ।

याचक लोग निर्धनता और दुःख से प्रेरित होकर तुम्हारे निकट आकर द्रव्य माँगेंगे, तब क्या तुम (उन याचको को देने के लिए) स्वय उस कौशल्या के पास जाकर हाथ फैलाओगी ? या (कुछ देने का सामर्थ्य न होने से) लज्जित होकर रहोगी ? अथवा