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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 549 में से

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पृष्ठ 194

१८४ | कंब रामायण

उसने तीन ज्योतियों (सूर्य, चन्द्र और अग्नि) के जैसे (अति उज्ज्वल) रत्नहार उसे भेंट किया।

वह निष्ठुर और क्रूर (मंथरा) चिल्लाई। धमकी देने लगी। उसने अपनी छोटी आँखों से आग उगलते हुए उसकी ओर देखा। कैकेयी की निंदा की। उष्ण निःश्वास भरा। रोई। अपने रूप को विकृत किया और (कैकेयी के द्वारा दिये गये) उस स्वर्णमय रत्नहार से धरती को गड्ढा बना दिया (अर्थात्, उस हार को धरती पर फेंक दिया।)

पीड़ा उत्पन्न करनेवाली उस कूबरी ने क्रोध से घूरकर कहा—तुम मदबुद्धि हो। भेद-भाव न होने से तुम अपने पुत्र-समेत बड़ा दुःख पाओगी। किन्तु, मैं दीर्घकाल तक तुम्हारी सौत (कौशल्या) की सेवा करना सहन नहीं कर सकूँगी।

अरुण अधरवाली सीता और नीलवर्ण राम सिंहासन पर आसीन रहे और तुम्हारा पुत्र धरती पर खड़ा रहे—जब ऐसी दशा उत्पन्न हुई है, तब इससे तुम कैसे आनन्दित होती हो? तुमने अपने मन में कैसी दृढ़ता पाई है?

कौशल्या अपना हित भूली नहीं। अतः, उसका पुत्र राज्य-संपत्ति पाकर उन्नति प्राप्त करेगा। भरत ऐश्वर्य से वंचित होगा; वह (भरत) न मरा, न जीवित ही रहा; वह किस प्रकार से अपना दुःख दूर कर सकेगा? तुम्हारा पुत्र बनकर जन्म लेने से उसका जीवन व्यर्थ हो गया।

यदि इस सारी पृथ्वी का शासन यह श्रेष्ठ (राम) ही अपने भाई (लक्ष्मण) के साथ अनन्त काल तक करता रहे, तो भरत और उसके भाई शत्रुघ्न को देश से दूर रहकर (अरण्य में) व्रतयुक्त तपस्या करने के लिए भेज देना ही उचित होगा।

मत्तगजों की सेना से युक्त, भूदेवी के प्यारे, सुन्दर तथा बजाये जानेवाले नगाड़ों से युक्त रहकर धरती का राज्य करनेवाले राजाओं की श्रेणी में भरत उत्पन्न नहीं हुआ है।

स्वर्णवीर-कंकणधारी चक्रवर्ती ने उस दिन क्यों अभागे भरत को शालवृक्षों से आवृत्त ऊँचे पर्वतों से युक्त दूरस्थ (कैकेय) देश में सत्वर भेज दिया, इसका कारण मुझे अब ज्ञात हो रहा है।

मंथरा आगे और भी कुछ वंचना-पूर्ण उक्तियाँ कहती हुई भरत के प्रति बोली—तुम्हारे प्रति भेदभाव रखकर (राम को) राज्य देनेवाले तुम्हारे पिता निष्ठुर हैं। (यह समाचार सुनकर हर्ष करनेवाली) तुम्हारी माता भी निष्ठुर है। हे मेरे तात! भरत, अब तुम क्या करनेवाले हो?

फिर उसने कैकेयी के प्रति कहा—तुम राजकुल में उत्पन्न हुई। राजवंश में ही बढ़ी और राजकुल की वधू बनीं। यों राजमहिषी बनी हुई तुम बड़ी विपदा-रूपी समुद्र में गिरनेवाली हो, मेरी बात भी तुम नहीं सुनती हो। क्या तुम्हें कुछ ज्ञान भी है?

विद्या, यौवन, अपार पराक्रम, धनुर्विद्या की चातुरी, सौंदर्य, वीरता इत्यादि अनेक गुण भरत में स्थित हैं; किन्तु आज वे सब घाम-भरी धरती पर गिरी मधु की बूँद जैसे हो गये हैं।

मंथरा ने मुंह कड़वा करके जो बातें कही, उनसे कैकेयी का क्रोध ऐसे बढ़ गया;