कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 193, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड १८३
लहर पर कोई प्रवाल लता फैली हो—इसी प्रकार कैकेयी, अपनी आँखों के कोरों से करुणा की वर्षा करती हुई एक उज्ज्वल पर्यंक पर शयन कर रही थी। उसके निकट मंथरा शीघ्र जा पहुँची।
उसने उत्पात की सूचना देनेवाले किसी दुष्ट ग्रह के समान वहाँ पहुँचकर कैकेयी के उन स्वर्ण आभरण-भूषित छोटे पैरो को अपने हाथों से छुआ, जो पैर ठली से विकसित होनेवाले कमल पुष्पों की तपस्या के फल से उन (कमलो) के योग्य उपमान बनकर उत्पन्न हुए थे।
मंथरा ने (जब उसके पैर) छुए, तब कैकेयी जग पड़ी, फिर भी दिव्य पातिव्रत्य से युक्त उस देवी के दीर्घ नेत्रो से निद्रा पूर्ण रूप से हटी नहीं। तब मथरा घोर निंदा-जनक पाप की प्रेरणा पाकर ये गढ़ी हुई बातें कहने लगी—
दुःखदायक करवाल-सदृश और विषपूर्ण (राहुनामक) सर्प के अपने निकट आने तक जिस प्रकार शीतल तथा रजत वर्ण चन्द्रमा अपनी उज्ज्वल किरणे फेकता रहता है, उसी प्रकार तुम भी, जबतक तुम्हे बहुत बड़ी विपदा प्राप्त न हो, तबतक उस (विपदा) की चिन्ता नहीं करती हुई सुख से सोती रहती हो।
क्रूर विष-सदृश मथरा के वचन सुनकर भाले जैसे नयनवाली कैकेयी ने कहा—शत्रुओ को परास्त करनेवाले धनुषो को धारण करनेवाले मेरे पुत्र सुखी हैं। वे अपने कार्यों में कभी धर्म से विमुख नहीं होते। फिर मुझे कौन-सी विपदा हो सकती हैं?
यशस्वी पुत्र को प्राप्त करने से कोई भी (व्यक्ति) दुःखमुक्त होकर सुखी हो जाता है। पञ्चभूतो के मिश्रण से उत्पन्न पृथ्वी पर, वेद-स्वरूप होकर जो राम अवतीर्ण हुआ है, उसे (पुत्र के रूप में) प्राप्त करने से अब मुझे कोई विपदा प्राप्त नहीं होगी।
अत्यधिक प्रेम के समुद्र में डूबी हुई कैकेयी ने ज्योंही ये वचन कहे, त्योंही पाप-समान उस वक्र मंथरा ने कहा—तुम्हारा हित नष्ट हो गया। तुम्हारा वैभव भी मिट गया। कौशल्या अपनी बुद्धि के बल से (ऐश्वर्य-युक्त जीवन) जीती है।
उसके यह कहने पर, उत्तम आभरणधारिणी कैकेयी ने कहा—राजाधिराज मेरे पति हैं, अवर्णनीय यशवाला भरत मेरा पुत्र है, इससे बढ़कर इस पृथ्वी पर वह (कौशल्या) देवी और क्या पा सकेगी?
तब मथरा ने कहा—वीरो के द्वारा उपहसित होते हुए और पौरुष को कुंठित करते हुए जिस (राम) ने ताड़का नामक स्त्री को मारने के लिए अपना धनुष झुकाया था, वह कल राज-मुकुट धारण करनेवाला है; यही उसका (अर्थात्, कौशल्या का) आनन्द-मय जीवन है।
मंथरा का यह प्रतिवचन सुनते ही, कैकेयी का मन, जो गरिमामय कौशल्या के मन के समान ही था, विरोध भाव से नहीं, किन्तु आनन्द से भर गया। इसका कारण कदाचित् यही है कि राम के पिता उसके मन में निवास करते थे।
उस निष्कलंक (कैकेयी) देवी का प्रेम-रूपी समुद्र उमड़ उठा। उसका अक्षीण चन्द्र-जैसा मुख और भी प्रकाशमान हुआ। उसका आनन्द वेला को पारकर बढ़ गया।