कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८२ | कंब रामायण |
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गोपुरों के द्वारों में चंद्र को छूनेवाले अत्यन्त तथा नूतन तोरण बाँधे गये। उनसे ऐसी कांति बिखर रही थी, जैसे प्रभातकालीन बाल-सूर्य पहले से भी अधिक कांति से युक्त हो गया हो।
उत्तम माणिक्यमय स्तंभ श्वेत वस्त्रों से आवृत्त होकर ऐसे लगते थे, जैसे पार्वती देवी को अर्द्धाङ्ग में रखे हुए विभूति रमाये हुए शिव भगवान् हों। प्रवालमय स्तंभ (श्वेत-वस्त्रों से आवृत्त होकर) हिमावृत सूर्य के समान लगते थे।
उस नगर की वीथियाँ, मुक्ताओं से चंद्रिका के फैलने से, घनी रत्न-पंक्तियों से सूर्यातप के फैलने से, नील रत्नों के किरण-पुंजों से, अंधकार के फैलने से, ज्योतिष शास्त्रज्ञों के द्वारा प्रकटित दिन के समान लगती थीं। (भाव यह है कि मानो ज्योतिषियों ने दिन के विविध रूपों को एक साथ उन वीथियों में प्रकट किया था।)
नाचनेवाले घोड़ों से युक्त रथ-समुदाय, पृथ्वी को देखने के लिए स्वर्ग से उतरे हुए देव-विमानों के जैसे लगते थे। मुख-पट्टी से भूषित विशाल मत्तगज सूर्य के साथ संचरण करनेवाले उदयाचल (पर्वत)-से लगते थे।
वैभव-पूर्ण उस नगर की स्फटिक शिलामय ऊँची दीवारों में जड़ित पद्मराग रत्न-श्रेणियाँ अपने प्रकाश से अंधकार को मिटा रही थीं। अतः, चक्रवाक के जोड़े कभी वियुक्त न होकर शान्तचित्त रहते थे।
सौधों से भरी वीथियों में पुष्पों की वर्षा, जल की वर्षा, नवीन सुगंध-चूर्णों की वर्षा, उज्ज्वल मुक्ताओं की वर्षा, आभरणों के रगड़ खाने से उत्पन्न स्वर्ण-धूलि की वर्षा--ये सब वर्षाएँ मेघ की वर्षा केसमान हो रही थीं।
मेघ जैसे मदस्रावी गज, कवच से आवृत्त तथा वीर-वलयधारी योद्धाओं के समान जा रहे थे। किंकिणी-भूषित करिणियाँ, लटकती मेखलाओंवाली नितम्बवती रमणियों के समान जा रही थीं।
उत्तरोत्तर बढ़नेवाला ऐश्वर्य, सौन्दर्य तथा सुख की उस नगरी में कुछ कमी नहीं थी। राम के राज्याभिषेक को देखने के लिए उस नगर में आये हुए देवलोक, इस भाँति से कि अभी हम स्वर्ग में ही हैं, अयोध्या में नहीं पहुँचे हैं, सोच में पड़ जाते थे।
देवलोक के समान शोभायमान उस नगर का शृंगार होने का वह कोलाहल सुन-कर क्रूरकर्मा रावण के पापों के समान स्थित तथा अन्य दुर्लभ कठोरता से युक्त मनवाली मंथरा वहाँ प्रकट हुई।
उस मंथरा का मन तड़प उठा। उसमें क्रोध उमड़ पड़ा। उसमें पीडा उत्पन्न हुई। उसकी आँखों से अग्नि बरसने लगी। वह अव्यवस्थित रूप से कुछ बड़बड़ाती हुई, त्रिभुवन को कुछ दुःख देने के लिए आगे बढ़ी।
पूर्वकाल में राम ने मिट्टी के ढेलों को अपने हाथ के धनुष पर रखकर उस (मंथरा) के कूबड़ पर मारा था, इस घटना को उसने स्मरण किया। क्रोध से वह अपने ओठ चबाने लगी और बिंब-समान अधरवाली कैकेयी के प्रासाद में गई।
चारों समुद्रों के रत्नों से युक्त होकर कमलों से पूर्ण एक अनुपम क्षीर-सागर की