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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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बालकाण्ड १५६

ब्राह्मणों के आशीर्वाद-घोष, आभरणों के सदृश सौंदर्य को बढ़ानेवाली नारी-मणियो के अभिनन्दन-गानो के घोष, पुष्पाहंकृत शिखावाले राजाओं तथा वंदनीय देवों के आशीर्वाद-घोष—इनके समान ही उत्तम शंख-वाद्य भी निनादित उठे ।

देवों के बरसाये कल्पक-पुष्प, राजाओ के बरसाये सोने के पुष्प, अन्य लोगो के बरसाये उज्ज्वल मोती और स्वयं विकसित पुष्प—इनसे यह पृथ्वी नक्षत्रों-से प्रकाशमान आकाश की तरह शोभित हो उठी ।

वीर ( रामचन्द्र ) ने, उस समय, सभी पवित्र मंत्रों का उच्चारण करके, प्रज्वलित अग्नि में घृत की आहुतियाँ दीं और सुन्दरी ( जानकी ) के पल्लव-कोमल पाणि का अपने विशाल शुभ हस्त से ग्रहण किया ।

उचित होम करनेवाले, विशाल भुजाओ से शोभायमान ( राम ) के संग जब ( सीता ) प्रज्वलित अग्नि की परिक्रमा ( भाँवरी ) करने लगी, तब सहज सुघड़ता से युक्त वह देवी ऐसी लगी, जैसे परिवर्तनशील जन्म-चक्र मे कहीं देह, आत्मा का अनुसरण करती जा रही हो । ( आत्मा शरीर की खोज मे जाती है, किन्तु शरीर आत्मा का अनुगमन नही करता । यहाँ पर इस 'अभूतोपमा' मे कवि की एक विलक्षण, किन्तु अतिसुन्दर उद्भावना है । )

सुन्दर तीन धागो के कंकण से युक्त उन दोनो ने होमाग्नि की प्रदक्षिणा करके नमस्कार किया । अन्य कर्त्तव्य कर्म सम्पन्न किये । कांतिपूर्ण सिल पर पद रखा । १ फिर, सम्मुख-स्थित, अचंचल पातिव्रत्यवाली अरुंधती ( नक्षत्र ) को देखा ।

( राम ने ) अन्य कर्त्तव्य पूरा करके, आनन्द-भरे, महातपस्वियो के चरणो से सिर लगाया । फिर, चक्रवर्ती ( दशरथ ) के चरणो की वंदना की और स्वर्ण-कंकणधारिणी सीता का कर अपने हाथ में लेकर अपने मनोहर भवन में जा पहुँचे ।

भेरियाँ गर्जन कर उठी, शंख बज उठे, चतुर्वेदों के घोष हो उठे, देवता आनन्द-घोष कर उठे, विविध शास्त्र तथा अभिनन्दन-गीत प्रतिध्वनित हुए, भ्रमर-समुदाय भी गुंजार कर उठे और समुद्र भी गर्जन कर उठे ।

— ( राम ने ) केकय-पुत्री के प्रकाशमान चरणों को, अपनी जननी के प्रति प्रेम से भी अधिक प्रेम के साथ नमस्कार किया । अपनी माता के चरणयुग को सिर पर धारण किया और फिर निष्कलुष मन से सुमित्रा के चरणों को प्रणाम किया ।

हंसिनी ( सीता ) ने भी उन तीनो देवियो के मनोहर स्वर्ण-सदृश चरण-कमलो को अपने सिर का भूषण बनाया । उन देवियो ने उमंग भरे मन से कहा—यह ( हमारे ) कुनार का भव्य आभरण बनी रहेगी और अविचल पातिव्रत्यवती अरुंधती भी इसे ( आदर्श के रूप मे ) देखेंगी ।

फिर उन देवियो ने शंख-वलयो से भूषित, कोकिल-स्वरवाली जानकी को अंक


१. दक्षिण में विवाह के समय अग्नि-प्रदक्षिणा करने के पश्चात् वधू सिल पर अपना दाहिना पैर रखती है और वर उसके अंगूठे का स्पर्श कर एक मन्त्र का उच्चारण करता है ।—अनु०