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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 170

१५८ | कंब रामायण

सहारा देते हुए जा रहे थे, मण्डप मे पहुँचते ही उन्होने (राम ने) महान् तपस्वी मुनिवरो को प्रणाम किया; फिर नीति-व्रतधारी अपने पिता के चरणो को नमस्कार करके (उनके) पार्श्व के आसन पर आसीन हो गये। तब—

मानो कोई अरुण स्वर्ण की लता, एक धनुष और दो मछलियो से शोभायमान चन्द्र को उठाये हुए, कलियो के साथ, रथ पर पूर्वदिशा में उदित हो रही हो, ऐसा दृश्य उपस्थित करती हुई जानकी उस मण्डप के मध्य आ पहुँची, जैसे (लक्ष्मी) पहले तरंगायित क्षीर सागर में उत्पन्न होकर, फिर भूमि पर अवतरित हो गई हो और अब किसी पर्वत के मध्य आविर्भूत हो।

विभूतियो से समृद्ध सब देवता लोग (उस मण्डपो में) आसीन कुमार (राम) को देखकर कहने लगे—भरे हुए वडे सागर को मंथन करने से उत्पन्न, सुवासित कुंतलोवाली (लक्ष्मी) ने जिस दिन (विष्णु को विवाह के चिह्नभूत) माला पहनाई थी, उस दिन से भी यह दिन अधिक मनोहर है।

जब, गर्जन करनेवाले समुद्र से घिरी हुई धरती की नारियो, देवांगनाओ तथा नाग-कन्याओं से भी (सीता) का लावण्य अत्यधिक है, तो उनके विवाह के समय (उनके) बढे हुए सौंदर्य का, अल्प बुद्धिवाला मै किस मुँह से वर्णन कर सकता हूँ ?

(विवाह की वह) शोभा देखने के लिए अन्तरिक्ष मे इन्द्र, शची के साथ आ पहुँचा। चन्द्रशेखर (अपनी) उमा के साथ आ पहुँचे, कमलासन भी वाणी देवी के साथ आ पहुँचे।

यज्ञोपवीत से शोभित वक्षवाले अपार समुद्र के सदृश वेदज्ञो के सघ से घिरे हुए वसिष्ठ, परिपाटी के अनुसार उस समारोह-पूर्ण विवाह को संपन्न कराने के लिए निर्दोष उपकरण (आदि) लेकर आनन्द के साथ आ पहुँचे।

(उन्होने) तंडुल¹ फैलाकर उसपर दर्भों को बिछाया। वेदोक्त विधान से (अग्नि-स्थापना के लिए उचित) स्थानो को निर्मित किया। कोमल पुष्पो को उन स्थानो के चारो ओर बिखेरा। होमाग्नि प्रज्वलित की और अनादि वेदमंत्रो का यथाविधि उच्चारण किया।

विवाह की वेदी पर आकर, विजयी वीर, महानुभाव (राम) और प्रेमभरी (उनकी) सगिनी, हस-तुल्य गतिवाली (सीता) विवाहोचित आसन पर आसीन हो गये। एक साथ आसीन वे दोनो क्रमशः ब्रह्मानन्द और (उसके उपायभूत) योग की समता करते थे।

चक्रवर्ती के कुमार के सम्मुख (स्थित होकर) जनक ने कहा--'परतत्त्व (विष्णु) तथा लक्ष्मी देवी के सदृश तुम मेरी रूपवती पुत्री के सग चिरजीवी रहो। और, यह कहकर स्वच्छ शीतल जल-धारा को (राम के) रक्तकमल सदृश विशाल हाथ में दिया। (अर्थात्, जनक ने अपनी कन्या को राम के प्रति प्रदान किया।)


१. कुछ विद्वानों ने मूल में, तडुल, के स्थान पर, 'तडिला' पाठ को माना है, जो सस्कृत, स्थण्डिल, का रूपान्तर माना गया है, जिसका अर्थ होता है 'मिट्टी का आस्तरण'। यह अर्थ भी उपयुक्त मालूम होता है।—अनु०