कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १५७
माणिक्य-दीपों से प्रज्वलित पन्नग-पर्यंक पर योगनिद्रा छोड़कर जो (विष्णु) अवतरित हुए हैं, वे इस प्रकार दैवकार्य के निमित्त विलक्षण अलंकार से सुशोभित हो गये।
(त्रिमूर्त्ति-रूपी) तीन परम तत्त्वों में जो प्रधान हैं, जो सृष्टि का आदि कारण हैं; जो संसार के संबंध को त्यागनेवालों के द्वारा प्राप्यमान ब्रह्मानन्द-स्वरूप हैं; तथा जो सर्व-पिता हैं, उस क्षीर-सागर से उत्पन्न अमृत-तुल्य (विष्णु के अंशभूत) श्रीराम ने जो अलंकार किया था; उसका वर्णन करना क्या संभव है ?
अनेक सहस्र गायें, पीत स्वर्ण, असीम भूमि, नव रत्न आदि का सत्पुरुषों को दान दिया; प्रशंसनीय चतुर्वेद ही जिनके धन हैं, वैसे (ब्राह्मणों) के द्वारा अभिनन्दित होते हुए (राम) रथ पर आरूढ हुए।
स्वर्ण की धुरीवाला; रजतमय योग्य चक्रों से अलंकृत, हीरकों से खचित पीठिका-युक्त तथा चारों ओर से जड़ित नवरत्नों की कांति से जाज्वल्यमान वह रथ, सूर्य के एक-चक्र रथ की तुलना करता था।
शास्त्रोक्त (उत्तम) लक्षणवाले, ध्यान के द्वारा जानने योग्य, शक्ति से पूर्ण, प्रभूत सौंदर्यवाले, धर्म आदि चार पुरुषार्थों के जैसे चार अश्व, संसार की प्रकृति को जाननेवाले (राम) के रथ में जोते गये।
इस प्रकार के रथ पर, अरुण के समान ही, आनन्दाश्रु से पूर्ण नेत्रवाले भरत, छत्र धारण करके (सारथि बनकर) आसीन हुए। वक्र धनुष-धारी लक्ष्मण तथा उनके अनुज शत्रुघ्न सुन्दर सोने की मूठवाले चामर डुलाने लगे।
अन्यों के लिए दुर्लभ, अति रमणीय आकारवाले (राम) के अत्यधिक सौंदर्य के कारण वैसा हुआ, या शांत मन से (राम के सौंदर्य का) चिंतन करते रहने के कारण वैसी दशा हुई—हम कुछ निश्चित रूप से नहीं जानते। चाहे जो भी कारण हो, (इस दृश्य को देखकर) इस पृथ्वी के लोग अनिमेष (अर्थात्, पलक न मारनेवाले देवता) हो गये।
(मिथिला के लोगों ने) पुष्प बरसाये सुगंध-चूर्ण बिखेरा कांतिवाले रत्न, स्वर्ण, वस्त्र आदि (दान में) दिये। उस मंगल-पूर्ण नगर के लोगों के ऐसे कार्यों का क्या कारण हैं, नहीं जानते। कदाचित्, उन्होंने (राम के) सौंदर्य (रूपी मद्य) को छककर पी लिया हो। (जिससे उन्मत्त होकर इस प्रकार के कार्य कर रहे हों।)
राम को देखनेवाली सब नारियाँ स्तब्ध हो खड़ी रहीं और उनके सब आभरण खिसककर गिर गये वह दृश्य ऐसा था; मानो सारी संपत्ति का दान करने के पश्चात् वे अपने पहने हुए आभरण भी लुटा रही हों।
समस्त संसार के सब आयुधधारी राजा लोग, हाथियों के झुंड के जैसे, (राम को) घेरकर आ रहे थे और निष्ठुर क्रोधवाले धनुर्धारी (राम) विजयी चक्रवर्ती (दशरथ) से अधिष्ठित मण्डप के निकट रथ से जा पहुँचे; जैसे अरुण-किरण सूर्य ऊँचे महामेरु पर जा पहुँचा हो।
ताजे फूलों के हार से शोभित वह वरद (राम) उस मण्डप के निकट रथ से उतरे; उनके दोनों पार्श्वों में भरत तथा लक्ष्मण उनके दोनों बाहुओं को आदर के साथ