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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 549 में से

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पृष्ठ 168

१५६ कंब रामायण

कल्पक वृक्ष, अपने याचको को दान देने के लिए, भव्य रत्न और स्वर्ण-वलयो को अपनी पुष्ट शाखाओ मे लिये खड़ा हो ।

मधुपूर्ण कमलपुष्प की देवी ( लक्ष्मी ) जिस वक्ष पर निरंतर क्रीडा करती हैं, उसके मध्य सुन्दर हार ऐसे चमक रहे थे, जैसे बिजली से शोभायमान मेघो के मध्य इन्द्र-धनुष चमक रहा हो ।

उनका उत्तरीय उन ज्ञानियो के निर्मल ज्ञान के समान उज्ज्वल था, जो किसी वस्तु को अपनाने या त्यागनेवाली स्वाधीन इच्छा रखते हे, मानो राम की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई असीम करुणा ही, उनके मुक्ताहार की कांति के सदृश ही, उस उत्तरीय के रूप मे पडी हो ।

जिनके समीप मे जाना भी दुष्कर है, ऐसे प्रकाश से पूर्ण तीन ज्योतियो ( अर्थात् सूर्य, चन्द्र और अग्नि ) के जैसा चमकता हुआ उनका यज्ञोपवीत, मानो ससार के सब लोगो को यह बताने के लिए ही तीन सूत्रो को एक रूप में बाँधकर बनाया गया हो कि त्रिभूतियां का स्वरूप स्वयं यह राम ही है ।

( राम की कटि में 'उदर-बंधन' नामक आभरण बाँधा गया । ) चारो दिशाओं में अत्यधिक स्वर्णिम आभा को फेंकता हुआ, मध्य मे एक बडे रत्न से जाज्वल्यमान 'उदर-बंधन' ऐसा लगता था, मानो एक दूसरे अडगोल के स्रष्टा ब्रह्मा को उत्पन्न करनेवाला एक बडा स्वर्ण-कमल विष्णु की नाभि से विकसित हुआ हो ।

उन्होने श्वेतवर्ण का कौशेय धारण किया, मानो उज्ज्वल रत्नो के आगार, महिमापूर्ण नील समुद्र को, (तरंग-रूपी) दीर्घकरो के युक्त, शीतल श्वेतवर्ण के क्षीर सागर ने आलिंगन-बद्ध कर लिया हो ।

समुद्र के जल मे उत्पन्न मुक्ताएँ और उज्ज्वल-नील रत्न, जिस करवाल मे चमक रहे थे, वह ( करवाल ) उनके कमनीय स्वर्णपट्ट मे बाँधा गया, जैसे ऊँचे स्वर्ण पर्वत ( मेरु ) की परिक्रमा करनेवाला सूर्य एक ही स्थान पर स्थिर खड़ा रह गया हो ।

उनकी कटि के पट्ट मे श्रेणियों मे जो मुक्ताएँ जड़ी थी, उनकी धवल कांति का पुज, उत्तरोत्तर विकसित होता हुआ, चारो ओर बिखर रहा था । कटि से एक रत्न-माला लटकाई गई, जो कमनीय खड्ग रूपी सूर्य के बालातप के सदृश चमक रही थी ।

( उनकी जघाओ पर 'किंपुरी' नामक आभरण पहनाया गया, जिसका आकार खुले मुखवाले मकर के समान था । )

किंपुरी नामक आभरण मे जो मकर के आकार का था, उसके नेत्रो के स्थान मे खचित रत्नो की कांति फैल रही थी तथा दाँतो ( के स्थान में खचित मुक्ताओ ) की कांति चाँदनी के समान छिटक रही थी । नकाशीदार उस आभरण ने चमकती विजली के समान सभी दिशाओ को प्रकाश से भर दिया ।

अव देखेगे कि ( ये चरण ) विशाल होकर कैसे लोको को नापतं हैं—यो सोचकर मानो पृथक्-पृथक् रूप में उनको रोकने के लिए ही, अति सूक्ष्म शिल्प-युक्त नूपुर और वीर वलय उनके शीतल, पुष्ट, रक्तकमल-सदृश चरणो को घेरकर पड़े रहे ।