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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 167

बालकाण्ड १५५

मीन के जैसे नेत्रवाली कन्याओ का, वेदज्ञ ब्राह्मणो को वेद-विहित रीति से दान किया। निष्कलंक तपस्यावाले अपने पूर्वज, जिनकी उपासना (कुलदेव के रूप में) करते रहे हैं, उन आदि ज्योतिस्वरूप (रंगनाथ)¹ के चरणो को प्रणाम किया।

(राक्षसो के द्वारा) नष्ट की जानेवाली तपस्या तथा धर्म के उद्धार के लिए निरन्तर वर्त्तमान रहनेवाली (भगवान् की) करुणा ही इस आकार में आई हो, इस प्रकार भासित होनेवाले, चित्रित करने के लिए भी दुष्कर (अर्थात्, उतने सुन्दर राम) ने अपने शरीर पर चन्दन-रस का लेप किया। वह दृश्य ऐसा था, मानो काले मेघ पर ज्योत्स्ना छा गई हो।

उमड़नेवाले अपार सागर ने मंगलप्रद तथा सर्व कलाओ से पूर्ण चन्द्रमा को अपने मध्य विकसित पाया हो, इस प्रकार का दृश्य उपस्थित करते हुए राम ने 'किडै' (नामक लाल जटामासी), लाल स्वर्ण के हार और पुष्पमालाओ को ऐंठकर अपने केशो में धारण किया।

(राम के दोनो कानो में) दो कुण्डल इस प्रकार शोभित हुए, मानो रात्रि और दिन में (सीता की) विरह-पीडा को देखकर, सूर्य और चन्द्रमा दूत बनकर (राम के पास) आये हो और सीता के मनोभावो को राम के कानो मे कह रहे हो।

नील विष को कठ में धारण करनेवाले, परशु-आयुधधारी (शिव) ने अपनी दीर्घ जटा पर चन्द्र की एक कला धारण की थी, अब (मानो उनकी शोभा को मंद करने के लिए ही राम ने) सब ज्योतिर्मय देवताओ (सूर्य, अग्नि, नक्षत्र आदि) को अपने सिर पर धारण कर लिया हो, इस प्रकार (राम ने) 'वीरपट्ट' (नामक आभरण) तथा, 'तिलक', (नामक आभरण) धारण किये।

(विष्णु के) चक्रायुध के निकटस्थ शंख की समता करनेवाले, अति सुन्दर (राम के वदन के निकटस्थ) कठ में लता-सदृश उज्ज्वल मुक्ताहार शोभायमान था, वह ऐसा लगता था, मानो घने कोमल कुन्तलोवाली (सीता) के मदहास (राम के) मन में भर गये हो ओर अब शरीर के बाहर भी उमड़ रहे हो।

(राम ने) अगद धारण किये, जिसमे पंक्तियो मे जड़े हीरे विदियो के समान चमकत थे और लाल माणिक्य अग्नि के जैसे लगते थे, अतः (उनकी) सुन्दर भुजाओ पर के अगद, प्राचीन काल में (क्षीरसागर के मथन के समय) मन्दर को लपेटे रहनेवाले वासुकि सर्प के समान दिखाई देते थे।

मुक्ताओ की बड़ी-बड़ी मनोहर लड़ियाँ (राम की) रक्षा करनेवाली दीर्घ-बाहुओ में बाँधी गईं, वे अतिविलक्षण आभरण मानो इस बात के चिह्न हों कि तीनो भुवनो के अनादि प्रभु यही हैं।

उनके, देखने योग्य (अति सुन्दर) करों में 'कटक' आभूषण चमक उठे, मानो


१. वाल्मीकि रामायण से विदित है कि रंगनाथ ही इक्ष्वाकु-वंश के राजाओ के कुलदेव थे श्रीरंगम (जिला तिरुचिरापल्ली) के क्षेत्र-पुराण से भी यही बात मालूम होती है।—अनु०