कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 166, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| १५४ | कम्ब रामायण |
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जिसकी सीमा को पहचानना कठिन है, जिस पर स्वर्णपत्र छपे हैं, जो पर्वत के जैसे ऊँचा उठा है, जिसमे विविध रत्न खचित हैं, वैसे मनोहर कंकणधारिणी सीता के विवाह-योग्य सामग्री से परिपूर्ण उस मण्डप मे राजाओ के अधिराज (दशरथ) आ पहुंचे।
श्वेतच्छत्र चाँदनी छिटका रहा था, आभरण-समूह, आँखो को चोधियाने-वाले सूर्य के जैसे प्रकाश को छिटका रहा था। भ्रमर-समुदाय संगीत गा रहे थे। विजय-प्रद अश्वो की टाप से उठी हुई धूल गगन को ढक रही थी। इस प्रकार (दशरथ) आ पहुँचे।
मंगल-भेरियाँ मेघ के समान गर्जन कर उठी। शंख-वाद्य भी बज उठे। तुरहियाँ युद्ध मे जिस प्रकार घोष करती हैं, वैसे ही बज उठी। ब्राह्मणो के द्वारा उच्चरित चतुर्वेद, रात्रि के समय समुद्र के घोष के समान ही शब्दित हो रहे थे।
रथ, हाथी और घोडे, झुण्ड-के-झुण्ड, पृथक्-पृथक् पक्तियो मे चल रहे थे। विशाल सेना-युक्त दशरथ की सेवा मे निरन्तर लगे रहनेवाले राजा भी इन्द्र के समीपस्थ देवताओ के समान शोभित हो रहे थे।
चक्रवर्त्ती इस प्रकार विवाह-मण्डप मे आ पहुँचे और स्वच्छ स्वर्ण के रत्नखचित आसन पर विराजमान हुए। मुनि और राजा यथाक्रम आसीन हुए, जनक भी अपने बन्धुवर्ग-सहित आसन पर आ विराजे।
राजा, मुनि, स्वर्गवासी हस-समान मृदुगतिवाली लक्ष्मी-सदृश रमणियाँ, सब एकत्र थे, वह विलक्षण विवाह-मण्डप उस मेरु पर्वत के तुल्य था, जिसके चारो ओर प्रकाश-पिण्ड घूमते रहते हैं।
'मय' के द्वारा प्राचीन काल मे निर्मित उस मण्डप मे मेघ थे (दाता लोग थे), बिजलियाँ थी (सुन्दर स्त्रियाँ थी), अनुपम नक्षत्र थे (राजा थे), अन्य तारिकाओ के सघ (राजाओ के परिवार) भी थे, दो प्रधान ज्योति-मडप, अर्थात् सूर्य-चन्द्र भी थे (दशरथ और जनक थे), अतः वह मण्डप मानो सृष्टि के आदि मे अज (ब्रह्मा) के द्वारा निर्मित अण्डगोल ही था।
आदरणीय तपस्यावाले मुनिवर, सभी राजा, देवता तथा अन्य जन उस मण्डप मे एकत्र हुए थे, अतः वह पृथ्वी स्वर्ग प्रभृति समस्त अण्डगोल को निगले हुए. विष्णु के नीलरत्न-तुल्य उदर के सदृश था।
भूलोक आदि सब लोको के जन (विवाह देखने की इच्छा से) प्रेरित होकर उस मडप मे इकट्ठे हुए। अब ओर क्या कहना है। अब हम सर्प-पर्यक अण्डगोल को छोडकर (अयोध्या मे) अवतीर्ण हुए राघव के कार्यों का वर्णन करेगे।
रामचन्द्र यथाविधि, उन सप्त समुद्रो के जल मे, जिनमे शख-समूह सञ्चरण करते हे तथा शाश्वत वेदो में प्रशसित गगा प्रभृति नदियो के जल मे स्नान किया।
फिर ब्रह्मा से तृण-पर्यन्त, समस्त प्राणिवर्ग को. उनके अनादि गाढ (अज्ञान के) अधकार को मिटाकर दीर्घ अपुनरावृत्ति के मार्ग मे (अपवर्ग मे) पहुँचानेवाला अपने (अर्थात् विष्णु के) चिह्न-भूत ऊर्ध्व-पुण्ड्र ¹ को धारण किया।
१. इस पद्य में ऊर्ध्व-पुण्ड्र का माहात्म्य कहा गया है।