कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १५.३
होकर कुछ स्त्रियों अपने चन्द्र-समान मुखो पर तिलक लगा रही थी. कोई अपने जूड़े में गजरे सजा रही थी; कुछ सेमल की रूई जैसे अपने कोमल अधरों पर रक्तरंग लगा रही थी।
मयूर-सदृश कुछ नारियाँ, जब श्रृंगार कर लेती या अपने पतियों मे मान करती हुई अपने आभरण उतार फेंकती, तब जो मोती, ग्ल. शंख (वलय). प्रवाल-सदृश लाल और कोमल सुगन्ध-लेप, छूटे हुए पुष्प आदि गिर पड़ते थे. कुछ दासियाँ उन सब वस्तुओ को इकट्ठा करके महली के बाहर फेंक देती थीं।
(कही) आगन्तुक राजा लोग जम थे. तो कहीं विप्र लोग इकट्ठे थे; कही मधुरस्वरवाली वीणा का संगीत आस्वाद करनेवाले (जम थे). तो कहीं सञ्चरण करनेवाले 'वाण' (जाति के गायक) एकत्र थे; कहीं झुण्ड बाँधकर चलनेवाली दासियाँ थी; तो कहीं घटिका-यन्त्र में विवाह लग्न के समय की गणना करनेवाले गणक लोग थे।
कहीं गणिकाएँ इकट्ठी थी; कहीं पर कुछ लोग विविध कलाएँ (इन्द्रजाल आदि) दिखा रहे थे। कुछ लोग राजप्रासाद के द्वार पर एकत्र हो रहे थे, जहाँ विविध देश के गजाधो के आभरणो से गिरे हुए भारी मोती तथा दीर्घ किरीटों के रगड़ खाने से गिरे हुए रत्न और स्वर्ण-चूर्ण के अबार पड़े हुए थे।
कुछ ऐसे पुरुष घूम रहे थे. जिनकी ढालो से धूप और पैने शूलों से चाँदनी छिटक रही थी। वे युद्ध के लिए जानेवाले ऊँचे दाँतोंवाले मत्तगज के जैसे थे। कुछ सुन्दरियाँ; आनन्द-नृत्य कर रही थी और अपने हास्य से पुरुषों के प्राण हर रही थी।
उज्ज्वल रत्नों की चमक के कारण सर्वत्र ऐसा प्रकाश फैला था कि न्यन-गोचर पदार्थ भी दृष्टि मे नही आते थे। देवता और पुष्पोलंकृत केशवाली देवांगनाएँ यह पहचान नही पाती थी कि स्वर्गपुरी वहाँ (स्वर्ग मे) है. अथवा यह (मिथिला) ही स्वर्गपुरी है और व्याकुल हो भटक रही थी।
कुछ लोग रथो पर आते थे; कुछ शिविकाओं मे आते थे, कुछ अन्य प्रकार के वाहनों पर आते थे. कुछ रत्नमय मुखपट्ठो से अलंकृत नेत्र-जैसे हाथियों पर आते थे; कुछ हथिनियो पर आते थे; कुछ पैदल आते थे और कुछ गाड़ियों पर आने थे।
कुछ मुक्ताभरणों से भूषित थे, कुछ पुराने पहने हुए रत्नाभरणों को निकालक नवीन श्रेष्ठ स्वर्णमय विविध आभरण पहने हुए थे. कुछ (नारियाँ) पुष्पमालाओं को घुँदराले केशो मे पहने हुए थी; कुछ विचित्र अलंकारयुक्त रेशमी वस्त्र धारण किये हुए थीं।
(कुछ सुन्दरियों) विष-समान नयनोंवाली थीं; कुछ अमृतसमान बोलीवाली थी. कुछ रक्त अधरवाली थी. कुछ उज्ज्वल मंद हासवाली थी; कुछ विशाल स्तन-भार से युक्त थी, कुछ सूक्ष्म कटिवाली थी; कुछ हंसगामिनी थी; और कुछ हथिनियो के सदृश चलने-वाली थी।
उस मिथिला-नगर की समृद्धि को एक ही स्थान पर; एक ही समय में एकत्र देखना असम्भव है। उसके बारे में सोचना भी दुष्कर है। आह! वह विवाह-दिन उतना वैभवपूर्ण था; जितना प्रकाशमान स्वर्गलोक मे देवेन्द्र के मुकुट-धारण (राज्याभिषेक) का उत्सव-दिन था।