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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 549 में से

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पृष्ठ 164
१५२कम्ब रामायण

अञ्जनवर्ण ( राम ) तथा कमल पर आसीन ( सीता ) देवी, कल परिपूर्ण मगल-युक्त विवाह के द्वारा परस्पर मिलेंगे—यह घोषणा होते ही दिनकर अपने अरुण करों से अधकार को चीरते हुए ऐसे उदित हुआ, मानो अपने वंशज के विवाह के दर्शनार्थ ही आ गया हो ।

कुछ लोग वटनवार बाँधने लगे । कुछ लोग खंभों पर रंग-बिरंगे कपडे लपेट कर सजाने लगे । कुछ पूर्ण कुभी पर वस्त्र लपेटने लगे , मेघस्पर्शी अट्टालिकाओ पर कुछ उज्ज्वल रत्न-खचित कवच डालने लगे । वेदो के तत्त्वज्ञ ब्राह्मणो को भोज देने के लिए कोई अमृतरसोपेत भोजन बनाने लगे ।

हसिनी की गतिवाली नारियाँ तथा वृषभ की गतिवाले पुरुष उस नित्य नवीन नगरी मे केले और पुगीवृक्षो को स्थान-स्थान पर गाड़ने लगे । कोई अति उत्तम मोतियो में से चुन-चुनकर भारी मुक्ताओं को पहनने लगे । कोई स्वर्णाभरण और कोई रत्नाभरण पहनने लगे ।

कोई सुगन्धित चन्दन तथा अगरु के अजन को वीथियो मे छिड़कने लगे । कोई पुष्पो को ( वीथियो मे ) बिखेरने लगे । कोई इन्द्रधनुष को लजानेवाले विविध कान्ति-पूर्ण रत्नो से खचित प्रासादो पर अमूल्य मुक्ताओ की झालर लटकाने लगे ।

( कुछ लोगो ने ) किरण-पुञ्जो को बिखेरनेवाले भारी रत्नदीपो को और शीतल अंकुरो से पूर्ण 'पालिका' नामक (मिट्टी के) पात्रो ¹ को उन स्फटिक वेदिकाओं पर सजाया, जो (वेदिकाएँ) किनारो पर के सुनहले वर्ण और अपनी श्वेतता के कारण एक साथ धूप और चाँदनी को फैला रही थी ।

( कुछ लोगो ने ) मंदर पर्वत-सदृश ऊँचे सौधो के ऑगनो में, इन्द्रलोक में जिस प्रकार नक्षत्रो की काति फैली रहती है, उसी प्रकार अनन्त काति फैलानेवाले भारी मोतियो की लड़ियो को लटकाकर 'सुतु पेडल' ( चंदोवे )² लगाये, जिससे धूप रुक गई ।

कही कुछ दासियो ने हीरको से खचित मरकत की वेदी पर स्वच्छ प्रकाशवाले दीप मजाये । चन्द्र को छूनेवाले उन्नत प्रासादो पर सूर्य-समान कातिवाली तथा सुनहले डडोवाली पताकाएं लगाईं और कोई अगरु लकड़ी को जलाकर सुगंध फैलाने लगी ।

कोई सुगध-पुष्पो को गाड़ियो पर लादकर ला रहे थे । कुछ लोग उपवनो से पत्तों और फलो को लादकर ला रहे थे , कुछ लोग 'कुरवै'³ नामक नृत्य करते हुए अपने कुडलो की काति को चारो ओर बिखेर रहे थे , कुछ लोग अन्न-पिंडो को खाकर तृप्त हुए मत्तगजो के माथो पर मुखपट्ट बाँध रहे थे ।

( कुछ नारियाँ ) चन्दन का लेप ( अपने शरीर पर ) लगा रही थी, कोई श्रेष्ठ वस्त्र पहन रही थी, कोई पुष्पो को अपने केशों मे सजा रही थी, निर्मल मुकुर के सामने खड़ी


१. विवाह आदि के अवसर पर मिट्टी के पात्रो मे नव-धान्य के अंकुर उगाये जाते हैं और शुभकार्य हो जाने के पश्चात् नदियो मे बहा दिये जाते हैं ।
२. दक्षिण मे विवाह के समय 'मुतु-पटल' लगाते है ।
३. 'कुरवै' नृत्य मे बहुत-से नर-नारी एक दूसरे का हाथ पकड़ वृत्ताकार मे नाचते ह ।