कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 163, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १५१
इस प्रकार विलाप करती हुई, पर्यंक पर लेटने में भी असमर्थ हो व्याकुलता के साथ सीता दुःख भोग रही थीं और उनके ( लज्जा आदि ) सहज गुणों के कारण उनकी विकलता अधिक होती जा रही थी। ऐसी रात्रि के समय, उधर अनघ ( रामचन्द्र ) अपने प्रासाद में, भरे हुए अन्धकार में, क्या सोच रहे थे और क्या बोल रहे थे--यह अब कहेंगे ।
पहले ( कन्या-प्रासाद पर ) देखा, तब अनिवार्य प्रेम की प्रेरणा से, नेत्रों ( की लेखनी ) को लेकर मन पर उसे अंकित कर लिया, फिर ( आज ) सम्मुख ही मैंने उसे देखा, तो भी उस अप्रमान सुन्दरी कन्या ( के सौंदर्य ) का पार नहीं पा रहा हूँ । जो बिजली को देख रहे हों, वे अन्य व्यापारों पर कैसे दृष्टि रख सकते हैं ?
हे लक्ष्मी-तुल्य सीता के मुख-मण्डल ( चन्द्र ) । सोचने पर ज्ञात होता है कि शाक और फल के उत्पादक काम-रूपी बीज के बढ़ने के लिए सहायक खाद तू ही है (अर्थात्, चन्द्रमा काम को बढ़ाता है, जिससे विरहावस्था में शाक का और संयोगावस्था में फल का रस मिलता है ।) हे चन्द्र ! तूने यह क्या किया ? मुझ, एक व्यक्ति के साथ क्या तू मित्रता नहीं कर सकता था ?
यह सर्वत्र व्याप्त अन्धकार ऐसा बढ़ गया है, मानो मेरे प्राणों को बाहर निकालने के लिए उस रमणी ( सीता ) के नयन ही इस प्रकार बढ़ गये हों । यह कभी क्षीण होनेवाला नहीं दीखता। यह अधिकाधिक इस प्रकार बढ़ रहा है, जिस प्रकार युद्ध में अपने प्रभु के मारे जाने पर भय के कारण युद्ध-रंग से भाग खड़े होनेवाले सैनिक का अपयश बढ़ता जाता है ।
वन्य हरिण के से नयनवाली उस सुन्दरी के संग गये हुए मेरे मन ! तूने मेरी चिन्ता कभी नहीं की ! कदाचित् तेरा मार्ग अधिक लम्बा है ( इसीसे अबतक नहीं लौटा है ) या उन्होंने ( सीता ने ) तेरी बात नहीं पूछी है, जिससे तू अभी तक वहीं अटका हुआ है, या तू भी मुझे भूल गया है ।
कठोर विष आँखों से आग उगलनेवाले, करवाल-जैसे तीक्ष्ण सर्प के दाँतों को अपना आवास बनाकर रहता है—यह कथन अतीत काल में सत्य था , किन्तु अब तो मेरे नयनों तथा मेरे मन में सदा अवस्थित ( सीता की ) कोमल दृष्टि में ही वह ( विष ) बसा हुआ है ।
पर्वत-प्रदेश, पुष्पों से भरे हुए सरोवरों के परिसर, विशाल उद्यान इत्यादि अनेक स्थान (खेलने योग्य) हैं, फिर भी अलभ्य अमृत से भी अधिक मीठे बोलवाली, और चमकते कुंतलोंवाली ( सीता ) के लिए क्रीडा का स्थान क्या मेरा हृदय ही है ?
देवों के प्रभु ( विष्णु के अवतार राम ) इस प्रकार के मनोभावों से समय व्यतीत कर रहे थे, उधर ( जनक ने ) हाथियों पर से यह ढिंढोरा पिटवाया कि भ्रमरों को मत्त करनेवाले कुंतलोंवाली ( सीता ) का विवाह कल होनेवाला है अतः पुष्पों, रत्नों तथा वस्त्रों से मिथिला नगरी सजाई जाय ।
ढिंढोरे के साथ ऐसी घोषणा होते ही, वृद्ध, युवक, सुवासित केशोंवाली स्त्रियाँ, सब एकत्र हुए । ( नगर को सजाने के लिए ) सब उतावले होने लगे तथा अपने वधु-मित्रों के साथ आनन्द-संलाप करते हुए उस दुर्लंघ्य रात्रि-रूपी समुद्र को पार कर लिया ।