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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 162

१५० | कंब रामायण

सरोवर को पा लिया हो, किन्तु उसमें उतरकर जल पीने का मार्ग न पाकर अत्यन्त व्याकुल हो उठा हो—स्वर्ण-कंकणधारिणी, कोकिलवाणी (सीता) की भी वही दशा हो गई।

(सीता रात्रि का सम्बोधन कर कहती हैं—) हे निष्ठुर रजनी ! क्या ऐसे भी लोग होते हैं, जो निर्बल व्यक्तियों के प्राण हरने का वीरवाद (डींग मारना) करते रहते हैं ? (अर्थात्, तू ऐसा ही व्यक्ति है) सूर्य का उदय होते ही मेरे प्रभु आ जायेंगे, अतः तू शीघ्र ही बीत जा, जिससे प्रभात होने मे विलम्ब न हो।

हे मेरे मन ! नीलसूर्य-सदृश (उन राम के) चरणों के संग ही तू चला गया और उनके आने के समय ही तू उनके साथ आनेवाला है। दीर्घ समय से मेरे संग रहनेवाले मेरे मन ! एक दिन के विलम्ब को भी न सहकर इस प्रकार छोड़ जानेवाले (व्यक्ति) भी क्या संसार मे होते हैं ?

तालवृक्ष पर रहनेवाले हे (चकवा) पक्षी ! यह रात्रि, जो गर्जन करते हुए सप्त समुद्रों के सदृश अपार (जान पड़ती) है, मुझ, प्रयत्नशीला (अर्थात्, राम की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करती हुई) के पाप के कारण यदि (रात्रि) व्यतीत न हो और प्रभात न होने पाये, तो क्या तू किंचित् भी न्यायान्याय का विचार न करके, एकाकी उड़ता हुआ (मेरी हत्या से उत्पन्न) अपयश का भार ढोता फिरेगा ?

तीक्ष्ण शूल और अग्नि की कठोरता तथा उष्णता को प्रकट करनेवाले आतप के सदृश ही छायी हुई हे चाँदनी ! तू ही कह, क्या इस संसार मे ऐसे भी लोग होते हैं, जो निरपराध अबलाओ के प्राण हरते रहते हैं।

सुरभि और शीतलता के आगार उष्णता को फैलानेवाले मुँह और प्रकाश-पुञ्ज-भूत चन्द्रिका नामक दंत-समूह से युक्त होकर, मलय-पर्वत की ऊँची तथा बड़ी कंदरा मे निवास करनेवाले हे दक्षिण अनिल नामक व्याघ्र ! क्या तू आहार की खोज में मेरे निकट आया है ?

वीथी मे संचरण करनेवाला, कालमेघ-सदृश एक वीर है, जो दिन-रात मुझे छोड़ता नही है, यह कैसा न्याय है ? उच्च कुल के राजकुमारो मे क्या ऐसे भी होते हैं, जो कन्याओ के निकट आ पहुँचते हैं ?

वह कठोर पुरुष (राम) विश्वास न करने योग्य कार्य करता रहता है, करुणा-हीन है और मुझे अपने संग नही लेता है। उस छलिया की भुजाओ से प्रेम करना भी क्या उचित है ? (अन्धकार-रूपी) इस कालिमा-पूर्ण समुद्र की सीमा भी नहीं दीख पड़ती है रात्रि का समय न जाने कितने युगो का होता है।

संगीत-नाद थमता नहीं है (आनन्द मनानेवाले लोग संगीत गा रहे हैं, जिससे विरहिणी सीता की वेदना बढ़ रही है उनकी ओर संकेत है)। दिन भी नहीं आता है, मेरी चिन्ता दूर नहीं होती है। यह रात्रि व्यतीत नहीं होती है, मन की व्यथाएँ मिटती नहीं हैं, आंख लगती नहीं है, क्या इस प्रकार दुःखित होना भी मेरे भाग्य मे है ?

हे समुद्र ! अपने शंख (रूपी कंकणों को) गिराता हुआ तू, उठ-उठकर गिरता है। तू अत्यन्त शिथिल हो जाने पर भी कभी नहीं सोता है। अतः, क्या तू भी कोई कन्या (अविवाहिता) है जो मन्मथ के प्राणहारी बाणों से व्याकुल है।