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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 18

४ | कम्ब रामायण

दिखाई पडत । यो अपने इन विविध रंगों के कारण यह (प्रवाह) गगन पर चमकनेवाले इन्द्र-धनुष की-सी शोभा दिखाने लगा।

वह प्रवाह कभी बड़े-बड़े प्रस्तर-खंडो को लुढकाता हुआ, कभी गगनचुम्बी वृक्षो को उखाड़ता हुआ और कभी अपने समीप-स्थित पत्र-शाखा जैसी सभी वस्तुओ को उठाये हुए चल रहा था, वह प्रवाह भी क्या था ? जब श्रीरामचन्द्र समुद्र पार करके लंका मे पहुँचना चाहते थे, तब (वह प्रवाह) हिल्लोलों से भरे हुए समुद्र में सेतु बाँधने का आयोजन करनेवाली वानर-सेना ही जान पड़ता था। (अर्थात्, पत्थरो तथा वृक्षो से भरा हुआ वह प्रवाह समुद्र पर पुल बाँधनेवाली वानर-सेना के सदृश दीखता था।)

उसके मीठे जल पर भँवरो और मक्खियो का झुण्ड मँडराता हुआ दिखाई पड़ता था, वह प्रवाह किनारो को लाँघकर उद्दाम उमंग के साथ बह चला; उसका अन्तर भाग स्वच्छ नहीं था ओर (वह) सागुवान¹ के बड़े-बड़े वृक्षों को गिराता हुआ दौड़ा जा रहा था, जैसे कोई मद्यप डकार लेते हुए भागा जा रहा हो।

उस प्रवाह मे बड़े-बड़े मृग थे, भारी मुखवाले मत्त गज थे; वह भयकर कोलाहल करता हुआ अपने आगे-आगे ध्वजाओ के समान बहुत-सी लताओं² को बहाता चला जा रहा था, (इन सबसे वह प्रवाह) ऐसा लगता था, मानो समुद्र पर चढ़ाई करने के लिए कोई बड़ी सेना को साथ लिये जा रहा हो।

[वर्षा-प्रवाह का वर्णन करने के पश्चात् अब कवि सरयू नदी का विशेष वर्णन करता है।]

क्षुब्ध जलधि से परिवृत इस धरती पर जीवन धारण करनेवाले जो प्राणी हैं, उनके लिए सरयूनदी मातृस्तन्य-सदृश है। सूर्यवंश के नरेश जिस महान् सद्धर्म का पालन अनादि काल से करते आ रहे थे, उसी धर्म का पालन वह नदी भी कर रही है।

सरयू की धारा, कोशल देश की रमणियों के बनाये सुगन्धपूर्ण, कुंकुम, केसर, कोष्ठ (एक सुगंधित द्रव्य), इलायची, शीतल चंदन, सिन्दूर, नागरमोथा, गुग्गुल, मोम आदि पदार्थो के मिलने से बहुत ही सुगंधित रहती है। (जब स्त्रियाँ नदी में स्नान करती थीं, तब ये वस्तुएँ उसके प्रवाह मे मिल जाती थी और नदी का जल सुगन्धित हो जाता था।)

सरयू की बाढ़, अपने जल-रूपी बाणो के कारण, आसपास रहनेवाले व्याध लोगो के छोटे-बड़े गाँवो मे बड़ी हलचल मचा देती है। वह व्याध-नारियों को अपनी छाती पीटकर रोते-कलपते हुए भागने पर बाध्य कर देती है। ऐसे समय में वह नदी शत्रुओं के लिए भयकर (किसी) वीर नरेश की सेना का दृश्य उपस्थित करती है।


¹ मद्यप और जल-प्रवाह दोनो के समान विशेषण दिये गये हैं। सागुवान पेड को तमिल मे 'तेवकु' कहते है। इस शब्द को क्रिया के रूप मे रखने पर दूसरा अर्थ निकलता है। 'डकार लेते हुए', मद्यप के पक्ष मे, यह अर्थ संगत होता है।

² तमिल मे 'कोडि' शब्द का अर्थ होता ह 'लता'। शब्दश्लेष से उसका दूसरा अर्थ 'ध्वजा' भी होता है। मूल मे इस शब्द का प्रयोग करके कवि ने बड़ा चमत्कार दिखाया है।