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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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बालकाण्ड ५

वह नदी, किनारे के छोटे-छोटे गाँवों में से, जमा हुआ गाढ़ा और सुगंधित दही, दूध, मक्खन और घी को छींकों के साथ ही उठा ले जाती है (वहा ले जाती है), कदंब-वृक्षों को गिरा देती है; हिरनी के समान भीरू नयनवाली ग्वालिनों के दुकूल बहा ले जाती है। प्रबल वेग से बहती हुई वह नदी, कालिय नाग पर, जो अपने फनों और धारियों से भयंकर लगता है—नाचनेवाले कृष्ण की समानता करती है।

सरयू का वह प्रबल प्रवाह अपने मार्ग में (बाँधों) के किवाड़ों को ढकेलकर आगे बढ़ जाता है; कृषक उसे देखते ही आनन्दित हो जाते हैं और हाथ उठा-उठाकर आनन्द-रव करने लगते हैं, नदी का पूरा भरा हुआ अग्रभाग किनारों से उमड़ता हुआ आगे बढ़ जाता है, उसके ऊपर भौंरे झुण्ड-के-झुण्ड मँडराते जाते हैं; वह यत्र-तत्र मोतियों और रत्नों को बिखेर देता है, बाढ़ को रोकने के लिए जहाँ-तहाँ गड़े हुए खूंटों को वीचि-रूपी अपने विशाल हाथों से उखाड़ता हुआ, लहलहाते हुए खेतों से भरे 'मरुदम्' १ (कहलाने-वाले) प्रदेश में ऐसे आ पहुँचता, जैसे कोई मत्तगज मदजल बहाता हुआ आया हो।

हिमाचल के ऊपर से आया हुआ वह प्रवाह, पर्वत (कुरिंजि) के पदार्थों को पर्वत की तलहटी पर के अरण्य (मुल्लै) प्रदेश में बहा ले जाता है और अरण्य के पदार्थों को खेतों और बगीचों से भरे हुए (मरुदम्) प्रदेश में लाकर फैला देता है तथा समुद्री तट (नेयदल) प्रदेश को अपनी उपजाऊ मिट्टी के द्वारा लहलहाते खेतों में परिवर्तित कर देता है। इस प्रकार, वह पर्वत अरण्य, खेतों आदि की वस्तुओं को अपने-अपने स्थानों से हटा-हटाकर दूसरे स्थानों पर रख देता है। देव, मनुष्य, पशु-पक्षी तथा स्थावर—इन चार प्रकार की योनियों में भ्रमण करते रहनेवाले प्राणियों के साथ जिस प्रकार उनके संचित कर्म (पाप और पुण्य) लगे चलते हैं और उन्हें भिन्न-भिन्न योनियों में उत्पन्न होने के लिए बाध्य करते हैं, उसी प्रकार यह नदी भी विभिन्न भू-प्रदेशों के पदार्थों को स्थानान्तरित करती हुई आगे बढ़ती है।

नदी की बाढ़ को बढ़ते हुए देखकर कृषकजन आनन्दित हो उठते हैं और 'पटह' २ बजाकर उसकी सूचना देते हैं। वह नदी अपनी वीचियों से जल-बिंदुओं तथा स्वर्ण और मोतियों को बिखेरती हुई, धरती को चीरती हुई, नालों की शाखा-प्रशाखाओं में बँटकर बहती हुई इस प्रकार दौड़ चलती है, जिस प्रकार किसी पुण्यवान् मनुष्य की वंशावली विभक्त होकर विकसित हो रही हो।

सरयू का प्रवाह हिमाचल पर उत्पन्न हुआ; वहाँ से चलकर वह समुद्र में जा मिला। वह आरंभ में एक ही रहा, परन्तु धीरे-धीरे असंख्य नालों, नहरों, तालाबों और


१. तमिल-लाक्षणकार भूमि को पाँच प्रकारों में विभाजित करते हैं— (१) कुरिंजि—पार्वतीय प्रदेश, (२) मुल्लै—अरण्य-प्रदेश, (३) मरुदम्—नदियों के जल से सिंचित समतल प्रदेश, (४) नेयदल—समुद्री तट और (५) पालै--वालूमय प्रदेश या मरूभूमि ।
२. प्राचीन तमिल देश में नहरों और नालों की रखवाली करने के लिए 'मल्ल' नामक लोग नियुक्त थे; नदी में जब पानी आता था, तब वे पटह-वाद्यों को बजाकर लोगों को सूचना देते थे, जिससे तट पर के गाँवों के लोग सूचना पाकर सावधान हो जाते थे।