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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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कम्ब रामायण

रूपों में बँट गया ; अनन्त वेदों के द्वारा प्रतिपाद्यमान जो अप्रमेय परब्रह्म है, वह एक और अद्वितीय होकर भी विभिन्न मतवादियों के सिद्धान्तों के द्वारा बहुधा प्रतिपादित है और तद्विषयक ज्ञान अनेक मतों में विभक्त हो गया है। उसी प्रकार सरयू नदी भी अनेक धाराओं में विभक्त हो गई है।

सरयू का प्रवाह मकरन्द उगलनेवाले उपवनों में, घने बग़ीचों में, कमल-भरी वापियों में, सुगन्धिमय तड़ागों में, मछली-सदा-कूँदों से भरे प्रचुर (पुष्कल) वनों में, एवं लहलहाते खेतों में, सर्वत्र होता बह चला, जैसे प्राणियों के नाना प्रकार के शरीरों में प्राण बहा करता है। (१-२०)

अध्याय २

कोशलदेश पटल

महर्षि वाल्मीकि ने अतिपरिष्कृत और सुन्दर श्लोकों में रामायण की रचना की है, जो देवताओं के लिए भी कर्णामृत के समान है। उस काव्य में वर्णित कोशल देश की महिमा, प्रेम से विवश होकर मैं गा रहा हूँ; किन्तु यह कार्य मेरे लिए वैसा ही दुष्कर है, जैसा गूँगे व्यक्ति के लिए बोलने का प्रयास करना।

वह कोशल देश बड़ा ही वैभवपूर्ण है; वहाँ के खेतों की मेड़ों पर मोती और शंखों के ढेर के झुंड बिखरे रहते हैं; तीव्र जल-धाराओं के किनारों पर सोने के ढेले पड़े रहते हैं; उन गर्तों में जहाँ भैंसें गोता लगाये पड़ी रहती हैं, कमलों के रक्त-पुष्प बड़े ही सुन्दर दृश्य उपस्थित करते हैं; जोतने के उपरान्त जब खेत समतल बना दिये जाते हैं, तब वहाँ मणियाँ चमकने लगती हैं; इतना ही नहीं, शालि-धान के खेतों में जहाँ निरन्तर जल का निकास होता रहता है, हंस आकर विश्राम करने लगते हैं; गन्ने के खेतों में रसभरा लाल-लाल मीठा मधु बहता रहता है और पुष्प-वाटिकाओं में झुण्ड-के-झुण्ड भौरें मँडराते रहते हैं।

वहाँ जीवन का कोलाहल खूब सुनाई पड़ता है: एक ओर गन्ने पेरने से ईख का रस, झरने के जल के समान, शब्द करता हुआ प्रवाहित होता है, तो दूसरी ओर नदियों के तट पर रहनेवाले शंख-कीटों के बोलने की ध्वनि सुनाई पड़ती है: एक ओर बड़े-बड़े बैल आपस में टकराकर बड़ा क्षोभ उत्पन्न करते हैं, तो दूसरी ओर तालाबों में महाकाय भैंसों के उतरने से उत्ताल-तरंग का शब्द होता है। इस प्रकार, नाना प्रकार की ध्वनियों का एक विचित्र कोलाहल उस 'मरुदम्' प्रदेश में सदा होता रहता है।

लहलहाते खेतों और सुन्दर वृक्षों का वह प्रदेश भी वैसा गंभीर है, मानो कोई राजा दरबार में सिंहासन पर आसीन हों और उसके सामने भाँट नाच रहे हों; कमल-कलिकाएँ दीप लिये खड़ी हों; मेघ मर्दल बजाते हों, भ्रमर गुंजार करके मधुर वीणा का नाद सुनाते हों, नदी के जल पर उठ-उठकर थिरकनेवाली चंचल लहरें यवनिका का दृश्य उपस्थित