कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ७
करती हो और कुवलय-पुष्पों का समुदाय अपने विशाल नयनों (पंखुड़ियों) को खोलकर इस सुमधुर दृश्य को मंत्र-मुग्ध होकर देखता खड़ा है।
वहाँ के विकसित कमल-पुष्पों पर भ्रमर तथा लक्ष्मी देवी विश्राम करती हैं, पुष्पमालाओं से अलंकृत रसिक-जनों पर रमणियों के कटाक्ष तथा कामदेव के बाण आह्वान करते हैं; बड़ी-बड़ी मेघराशियों से गिरनेवाली जलधाराएँ प्रवाल तथा मोतियों की संपदा उत्पन्न करती हैं; वहाँ के निगमियों की जिह्वा पर सदा सत्यवचन तथा शास्त्र-चर्चा निवास करती है।
शंख-कीट तालाबों में (निर्भय होकर) विश्राम करते हैं, (क्योंकि) भैंसे (उन्हें कष्ट न देकर) वृक्षों की शीतल छाया में विश्राम कर रही हैं; भ्रमर (नगर-निवासिनियों की पुष्पमालाओं पर) विश्राम करते हैं (क्योंकि) लक्ष्मी देवी कमल-पुष्प पर विश्राम कर रही हैं; सीपियाँ (खेत की) मेड़ों पर विश्राम करती हैं; (क्योंकि) कछुए कीचड़ में विश्राम कर रहे हैं; हंस धान के अग्रभागों पर विश्राम करते हैं; (क्योंकि) मोर (उन्हें कष्ट न देकर) उपवनों में विश्राम कर रहे हैं।
(उस देश के वैभव की कितनी प्रशंसा करूँ?) वहाँ खेतों में हल जोतने पर सोना निकल पड़ता है, उसको समतल बनाने पर रत्न बिखर जाते हैं; शंख मोती उगलते हैं; धान की सुनहली बालियाँ हैं; मछलियाँ हैं और कोमल पत्तेवाले गन्ने हैं; भ्रमरों, कमल-पुष्पों एवं कृषकों के हर्षोत्फुल्ल मुखों से परिपूर्ण वह देश कितना नयनाभिराम है?
प्रभात के समय मधुर स्वरवाले 'याल्'-वाद्य (एक प्रकार की वीणा) को हाथ में लेकर, मृदंग की ध्वनि के साथ जब मधु-पान से मस्त गवैये गाने लगते हैं, तब उस संगीत-लहरी को सुनकर रजत-प्रासादों में, सुनहली धूप की छटा बिखेरनेवाले स्वर्ण-पर्यंकों पर निद्रामग्न मयूर-पंख के जैसे नयनवाली तरुणियाँ, जाग उठती हैं।
वहाँ एक ओर कोल्हुओं से गन्ने का रस निर्झर के रूप में बहता है, तो दूसरी ओर नारियल के कटे हुए घौंदों से मीठा रस प्रवाहित होता है। कहीं उपवनों में पके हुए फलों का मीठा रस चू रहा है, तो कहीं पुष्पों से मकरन्द झरकर नीचे गिर रहा है। ये सभी रस मिलकर, लहराती हुई धारा बनकर, जब समुद्र में जा गिरते हैं, तब समुद्र के मीन उन रसों को पीकर मस्त हो जाते हैं।
मधु पीकर मस्त हुए कृषक लोग खेत निराने जाते हैं; वहाँ वे खेतों में पौधों के साथ उगे हुए कमल, कुमुद आदि पुष्पों में, मधुर स्वरवाली कृषक-बालाओं के नयन, कर, चरण आदि अंगों की छटा देखते हुए निराना भूल जाते हैं और यों ही इधर-उधर फिरते रहते हैं। नीच जन जब स्त्रियों पर आसक्त हो जाते हैं, तब उस आसक्ति को किसी भी अवस्था में नहीं छोड़ते।
वहाँ की रमणियों के सौन्दर्य का क्या कहना? उनके मधुर स्वर, मनोहर कटाक्ष, जो कटार के जैसे पैने हैं, पुरुषों के मन को हर लेते हैं; उनकी विद्युत् की-सी छटा अवर्णनीय है, उनके केश पुष्प, कस्तूरी आदि सुगंधित द्रव्यों से सुवासित हैं; जब वे नदियों में स्नान करती हैं तो नदी का जल उनके केशों की सुगंधि से सुवासित हो जाता है;