कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 22, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८ | कंब रामायण |
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तना ही नहीं, जब वह जल समुद्र में जाकर गिरता है, तब सारे समुद्र की दुर्गन्ध को अपनी उस सुगंधि से मिटा देता है।
यहाँ पुरुष अतिरूपवान् हैं, उनके कानों और अन्य अंगों में कुण्डल आदि आभूषण शोभा देते हैं, उनके शरीर चन्दन, कर्पूर आदि से लिप्त रहते हैं; जब वे नदियों में स्नान करते हैं, तब नदियाँ उन सुगंधित द्रव्यों से भर जाती हैं और जिन खेतों को वे सींचती हैं, उनकी मिट्टी भी सुवासित होकर कर्पूर आदि की गंध बिखेरती है, जिस कारण से भौंरों के झुण्ड सदा उस मिट्टी पर ही मँडराते रहते हैं।
मीन के समान नेत्रवाली कृषक-बालाओं के पीछे-पीछे राजहंसिनियाँ, उनकी चाल का अनुकरण करती हुईं, भटक जाती हैं, तो कमल की सेज पर सोये हुए अपने बच्चों को भी भूल जाती हैं; हंस-शिशु निद्रा से उठकर भूख से चिल्ला उठते हैं, उन्हें देखकर भैंसों को अपने बछड़ों की याद आ जाती है और उनके स्तनों से दूध स्रवित होने लगता है, उस दूध को पीकर हंस-शिशु तृप्त हो जाते हैं, फिर हरे-हरे मेंढक लोरियाँ गाकर उन्हें सुला देते हैं।
वहाँ के उद्यानों में कहीं कोयल का जोड़ा, एक दूसरे को प्यार करता हुआ बैठा है; कहीं सुन्दर मयूर नाच रहे हैं; उन उद्यानों की शोभा, विशालनयन नर्तकियों की नृत्यशालाओं के लिए भी शृंगार है; प्रातःकाल के समय, मधुपान से मत्त भ्रमर भी संध्या-गीत गा उठते हैं (प्रभात-गीत गाने की सुध उन्हें नहीं रहती) : पद्म-पर्यंको में सोये हुए राजहंस उस ध्वनि को सुनकर अचानक जाग उठते हैं।
कोशल देश के निवासी मनोविनोदों में अपना समय व्यतीत करते हैं। कहीं सभी गुणों से सम्पन्न अपने-अपने योग्य सुन्दरियों के साथ युवक विवाह-संबंध करते हैं; कहीं लोग चील के साथ उड़नेवाली परछाईं के जैसे संगीत का रसास्वादन करते हुए मस्त होते हैं (अर्थात, संगीत साहित्य का उसी प्रकार अनुसरण करता है, जिस प्रकार छाया उड़नेवाले पक्षी का अनुसरण करती है), कहीं रसिकजन अमृत से भी श्रेष्ठ काव्य-माधुर्य का पान करने में संलग्न हैं; कहीं अतिथि-सत्कार हो रहे हैं, जहाँ गृहस्थजन अतिथियों की मुखाकृति को देखकर ही उनके मनोभाव समझ लेते हैं और उन्हें उचित उपचार से संतुष्ट कर आनन्द प्राप्त करते हैं।
कहीं लोग एकत्र होकर मुर्गों का युद्ध देखते हैं, पूर्व-वैर न होने पर भी, ये कुक्कुट एक दूसरे पर बड़ा क्रोध दिखाते हैं, उनके मन में रोष भरा है, सिर पर की कलँगी उनकी लाल-लाल आँखों से भी अधिक रक्तिम होकर चमकती है, टाँगों में बँधी छोटी-छोटी पेनी छुरियों से वे एक दूसरे पर चोट करते हुए अमन्द उत्साह से घनघोर युद्ध करते हैं, वे कुक्कुट यदि अपने वीरता-पूर्ण जीवन में कोई कमी रखते हैं, तो यही कि वे जीवन की सार्थकता को नहीं पहचानते।
कहीं लोग भैंसों को लड़ाकर उसका तमाशा देखते हैं, लाल आँखवाले वे भैंसे बड़े रोष के साथ एक दूसरे पर आघात करते हैं और एक दूसरे को ढकेलने की चेष्टा करते हैं; ऐसा प्रतीत होता है, मानो विश्व के नाना पदार्थों को एक रूप बना देनेवाला घोर