कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 270, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| २६० | कंब रामायण |
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तुम वेदों में प्रतिपादित अश्वमेध यज्ञ करते थे और वाद्यों के शब्द से युक्त सेना के साथ जाकर अन्य राजाओं के द्वारा समर्पित राजस्व को ब्राह्मणों को दक्षिणा के रूप में दान कर देते थे । इस प्रकार, गार्हपत्य अग्नि को प्रज्वलित करते रहते थे । यह सब कार्य छोड़कर क्या तुम स्वर्ग में निष्क्रिय बैठ सकते हो ?
सात हाथ ऊँचे तथा मद बहानेवाले हाथियों के स्वामी ! क्या यह सोचकर कि श्यामल (राम) (शासन चक्र धारण किये बिना) खाली हाथ रहता है, उन (राम) को शासन का भार देने के लिए तुम इस संसार को छोड़कर चले गये ?
तुमको तप में आसक्ति नहीं थी । अतएव, पहले की हुई बड़ी तपस्या के फलस्वरूप प्राप्त रामचन्द्र को, राज्य मिलने पर होनेवाले अभिषेक के उत्सव की शोभा भी, अपने विशाल नयनों से देखने का भाग्य तुम्हे नही मिला ।
पिता की मृत्यु से उत्पन्न दुःख का सहन न करते हुए भरत ने इस प्रकार के वचन कहे और वे इस प्रकार पिघल उठे कि उनके नेत्रों से नदी-प्रवाह के समान अश्रुधारा वह चली । फिर, वह यम-सदृश धनुर्धारी भरत स्वयं ही अपने आपको सांत्वना देकर किंचित् स्वस्थ हो बोले—
मेरे पिता, मेरी माता, मेरे भगवान्, मेरा भाई, सब कुछ वे अपार मद्गुणाकर राम ही हैं । अतः, जबतक उनके वीर-वलय-भूषित चरणों को नमस्कार न करूँगा, तबतक मेरे मन की पीडा दूर नहीं होगी ।
वह वचन सुनते ही घोर वज्र-तुल्य वचनवाली कैकेयी पुनः बोल उठी—हे शत्रु-नाशक धनुर्धारी ! वह (राम) अपनी देवी तथा भाई-सहित वनवास को गया है ।
(राम) वनवास के लिए गया है ।—कैकेयी के कहे इस वाक्य को सोचकर भरत ऐसे हुए, जैसे उन्होंने आग निगली हो । वे आशंकित होकर बोले—अहो ! मेरे पापकर्म कितने भयंकर हैं ? न जाने, मुझे अभी और क्या-क्या समाचार सुनने हैं ।
पीडा से मौन रहनेवाले उस पुरुष-श्रेष्ठ (भरत) ने पूछा—वीरवलय-धारी उन राम का अरण्य में जाना क्या किसी बुरे कार्य के परिणामस्वरूप हुआ ? या यह दैवी कोप का परिणाम है ? अथवा अति बलवान् नियति का विधान है ? किस कारण से यह हुआ ?
यदि राम स्वयं कोई बुरा कार्य भी करें, तो वह (कार्य) इस संसार के सब प्राणियों के लिए माता के कार्य (जैसे अपने बच्चे के हाथ-पैर दबाकर उसके मुँह में औषध आदि डालने के) जैसे ही हितकारी होगा । राम का वन-गमन क्या पिता के स्वर्ग सिधारने के पश्चात् हुआ या उसके पूर्व हुआ ? कृपया बताओ ।
तब कैकेयी ने उत्तर दिया—राम का वन-गमन गुरुजनों के प्रति कोई अपराध करने के कारण नहीं हुआ । गर्व के कारण भी उसे वन नहीं जाना पड़ा । दैवी प्रकोप से भी यह नहीं हुआ । सूर्य-समान राजवंश में उत्पन्न चक्रवर्ती (दशरथ) के जीवित रहते समय ही वह वन को चला गया ।
तब भरत ने प्रश्न किया—राम का अपना किया हुआ कोई अपराध नहीं, शत्रुओं की दी हुई पराजय नहीं, दैवी प्रकोप भी नहीं है । तो भी पिता के जीवित रहते हुए