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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 549 में से

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पृष्ठ 269

अयोध्याकाण्ड २५६

को नमस्कार करने के लिए आया हूँ। पिता के दर्शन करने के लिए मेरा मन आतुर हो रहा है, पौरुष से पूर्ण तथा दीर्घ मुकुटधारी चक्रवर्त्ती कहाँ हैं, बताओ। यह कहकर भरत हाथ जोड़कर खड़ा रहा।

भरत के यह पूछने पर अव्याकुल चित्तवाली कैकेयी ने कहा—दानवों का विनाश करनेवाली सेना से युक्त तथा भ्रमरों से अंचित पुष्पमाला धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती, देवताओं के नमस्कार का पात्र बनते हुए स्वर्ग को सिधार गये हैं, तुम चिन्ता न करो।

आहत करनेवाले वह वचन ज्योंही भरत के कानों में पड़े, त्योंही घुँघराले केशों से शोभायमान वह निःसङ्ग होकर गिर पड़े। विलब तक ऐसे मूर्च्छित पड़े रहे, जैसे कोई बड़ा वृक्ष वज्र से आहत होकर गिरा हो।

फिर, किंचित् प्रज्ञा प्राप्त कर भरत ने मंद पड़ी हुई अपनी मुखकांति के साथ एवं प्रफुल्ल कमल-जैसे नेत्रों में अश्रु भरकर माता को देखकर कहा—कानों में जैसे किसी ने अग्नि-ज्वाला रख दी हो—ऐसे कठोर वचन कहने का विचार तक करनेवाला तुम्हारे अतिरिक्त और कौन हो सकता है ?

सुब्रह्मण्य (शिव के पुत्र कार्त्तिकेय) से भी अधिक सुन्दर वह कुमार (भरत), बड़ी वेदना के साथ उठे। पुनः धरती पर गिर पड़े। उष्ण निःश्वास भरे। रोये। फिर, ये वचन कहने लगे—

हे पिता ! तुमने धर्म को विस्मृत कर दिया। दया को मिटा दिया। अत्युत्तम करुणा-रूपी सम्पत्ति को मिटाकर इस संसार को छोड़ चले। हाय ! तुमने न्याय को भी भुला दिया। इससे बढ़कर दोष और क्या हो सकता है ?

तुमने क्रोध-रूपी दुर्गुण को मिटा दिया था। काम-रूपी अग्नि को बुझा दिया था तथा लोभ आदि के समूह को भी विध्वस्त किया था। सब लोगों के मन के अनुकूल चलने-वाले, हे उदारगुण ! अब दूसरों को भूलकर केवल अपने मन के अनुसार कार्य करना (अर्थात्, हम सबकी इच्छा के विरुद्ध इस संसार को छोड़ जाना) क्या उचित है ?

हे प्रभु ! इस कुल के महान् पूर्व-पुरुष, सूर्य आदि के वीर चारित्र्य को तुमने पुनः नवीन कर दिखाया था। ललाट-नेत्र (शिव) के दृढ़ धनुष को तोड़नेवाले अपने पुत्र (राम) को छोड़कर तुम कैसे चले गये ?

हे तात ! न्याय-मार्ग से आज्ञा-चक्र प्रवर्त्तित करनेवाले राजन् ! इस संसार में किसी भी वंश के हों, सब लोग तुम्हारे सम्मुख याचक ही थे। इसलिए (यहाँ अपने समान मित्रों को न पाकर) क्या उत्तम मित्रों को पाने की इच्छा से तुम स्वर्ग गये हो ?

मल्ल युद्ध में चतुर विशाल कंधोंवाले ! चिरकाल से छाया देते रहनेवाले तुम्हारे श्वेतच्छत्र की विशाल छाया में विश्राम प्राप्त करनेवाले सब प्राणियों को व्याकुल ही छोड़कर क्या तुमने स्वयं (स्वर्ग में) कल्प-वृक्ष की छाया में सुखपूर्वक निवासकरने की इच्छा की है ?

हे तात ! क्या शंबर के समान असुर अब भी आकाश में रहते हैं ? क्या देवता लोग असुरों से हारकर अपने स्वर्ग को भी खोकर रक्षा की प्रार्थना करते हुए तुम्हारी शरण में आये थे ?

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