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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 549 में से

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पृष्ठ 268
२५८कंब रामायण

( भरत ने उस नगर में ) उन नगाडों का शब्द नहीं सुना, जो ( नगांड ) मानो विशाल जनता को यह सूचना देते बजते रहते थे कि राजा को यथेष्ट यश देते हुए यहाँ की समस्त सम्पत्ति को ले जाओ।

भ्रमरों से पिये जानेवाले मधु से युक्त पुष्पमाला को धारण किये हुए भरत ने मंगल-गीत गानेवालों को तथा स्तुति-पाठ करनेवालों को प्रचुर मात्रा में उत्तम हाथी-हथिनी, अन्य सम्पत्ति आदि पुरस्कार के रूप में ले जाते हुए नहीं देखा।

लोक-रक्षक चक्रवर्त्ती के पुत्र ( भरत ) ने भूसुरों ( अर्थात् ब्राह्मणों ) को दान के रूप में गाय, गज, सुन्दर सम्पत्ति आदि को जाते हुए नहीं देखा।

मँडरानेवाले भ्रमरों एव वीणा आदि से सप्त स्वर-युक्त संगीत न गाये जाने के कारण वे ( अर्थात, भ्रमर और वीणा आदि वाद्य ) आम के टिकोरे-जैसे नयनोंवाली ( मूक ) नारियों के केशों की समता कर रहे थे।

उस नगर की वीथियों में रथ, घोडे, हाथी, शिविका, शकट आदि नहीं दिखाई देते थे। अतः, वे ( वीथियाँ ) जल के सूखने पर सिकतामय दिखनेवाली नदियों के समान शोभा-विहीन लगती थीं।

सज्जनों के द्वारा प्रशंसित सद्गुणों से पूर्ण भरत ने नगर के भीतरी प्रदेश को अपनी पूर्व दशा से विहीन देखकर अपने भाई ( शत्रुघ्न ) से कहा—हे अनुज ! चक्रवर्त्ती के निवासभूत इस राजधानी की ऐसी दशा क्यों हुई ?

शत्रुओं को वीर-स्वर्ग पहुँचानेवाले तथा सजल मेघ-जैसे कंधोंवाले हे भाई ! यह नगर मीन-समान नयनोंवाली लक्ष्मी से विहीन विशाल क्षीर-सागर के जैसा लग रहा है, देखो।

तब उत्तम रत्न-खचित आभरणों से भूषित सिंह-समान अनुज ( शत्रुघ्न ) ने हाथ जोडकर निवेदन किया—ऐसा लगता है कि इस नगर में कोई अति दारुण शोकप्रद घटना हुई है, जो साधारण नहीं है। लक्ष्मी भी युगान्त तक अविनाशी रहनेवाले इस नगर को छोड़कर चली गई हैं।

इतने में, कुछ अधिक सोचने के पूर्व ही चक्रवर्ती-कुमार विशाल तोरण से भूषित अत्युन्नत राजप्रासाद के द्वार पर आ पहुँचे और तुरन्त अपने पिता के विश्राम-स्थान में गये।

पर्वतों को लज्जित करनेवाले ऊँचे कंधों से शोभायमान भरत ने जाकर देखा, किन्तु कहीं भी अपने पराक्रमशाली पिता को नहीं देखा। तब उनके मन में आशंका उत्पन्न हुई कि अत्र पिता के न देखने का कारण कुछ साधारण नहीं है।

उस समय, अपने पिता को ढूँढ़नेवाले और अपने पवित्र करों से उनके चरणों को छूने की इच्छा रखनेवाले भरत से, बाँस-जैसे कंधोंवाली एक दासी ने कहा—माता आपका स्मरण कर रही हैं। आप इधर आइए।

भरत ने आकर अपनी माता ( कैकेयी ) के चरणों का नमस्कार किया। माता ने मन-भर उनका आलिंगन किया और पूछा—मेरे पिता, मेरे भाई आदि सब कुशल हैं न ? अपार गुणाकर भरत ने कहा—हाँ वे सब कुशल हैं।

तब भरत ने कहा—मैं उमड़नेवाले प्रेम से पूर्ण चक्रवर्ती के कमल-समान चरणों