कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 267, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २५७
मधुर फलों के रस विशाल जलाशयों में भर रहे थे और चारों ओर बहकर व्यर्थ हो रहे थे। मनोहर पुष्पों के समूह तोड़े न जाकर पौधों पर ही विकसित होकर, फिर कुम्हलाकर झर रहे थे।
फसल को काटने का उचित समय को जाननेवाले किसानो के अभाव से शालि-धान के पौधे, आम्र-रस की धारा के बहने के कारण, सिर झुकाये टूटकर खड़े थे और धान धरती पर झरकर अंकुरित हो रहे थे।
तिलपुष्प-जैसी नासिकावाली तथा उन खेतो में जहाँ पक्षी आनन्द से सञ्चरण करते थे, काम करनेवाली अंत्यज-नारियाँ काम छोड़कर दुःखी पड़ी थीं, मानों वे अपने प्रियतमो से मान करके निराने का काम छोड़ बैठी हों।
शुक मौन हो बैठे थे। सुन्दर केशोंवाली स्त्रियाँ अपनी सखियों का दौत्य करती हुई उन (सखियों) के प्रियतमों के निकट नहीं जा रही थीं। नगाडे नहीं बज रहे थे। स्वर्ण से अलंकृत वीथियों में विवाह आदि के जुलूस नहीं निकल रहे थे।
संगीत-शास्त्रो में कथित विधान के अनुसार बनाई गई मधुर नादवाली बाँसुरी अब नहीं बज रही थी। नृत्यशालाओ तथा जलाशयो में नृत्य तथा जल-क्रीडा नहीं हो रही थी। (लोगो के) शिर पुष्पालंकार से विहीन थे। विद्युत्-निवारक यन्त्री से युक्त प्रासाद धान कूटनेवाली स्त्रियो के गीतों से विहीन थे।
(लोगो के) प्रकाशमान मुख हास-हीन थे। सौध सुगन्धित अगरु-धूम से विहीन थे। दीप पुष्ट ज्वाला से विहीन हो मंद पड़े थे। नारियो के केश मधुपूर्ण पुष्पों से विहीन थे।
भली भाँति बढ़े हुए तथा लहलहाते हुए सस्य के पौधे, विशाल नालो के निकट रहने पर भी किसी के द्वारा उन नालों में पानी को मोड़कर न बहाने के कारण उसी प्रकार शुष्क खड़े थे, जिस प्रकार निष्ठुर लोभी के द्वार पर, दान पाने की इच्छा से आया हुआ व्यक्ति हो।
वर्णन करने को भी असाध्य, अपार सम्पत्ति से समृद्ध वह कौशल देश, पुष्पहीन हो, पुष्प पर आसीन लक्ष्मी से विहीन हो एवं सारी शोभा से रहित होकर प्राण-विहीन देह के समान लगता था।
इस प्रकार के कौशल देश को देखकर भरत बहुत दुःखी हुए, किन्तु वहाँ घटित किसी वृत्तान्त को न जानने से यह सोचते हुए कि शायद हम अब कोई शोक-समाचार सुनने जा रहे हैं, वे रह-रहकर आह भर रहे थे।
सत्य नामक उत्तम आभरण से भूषित चक्रवर्ती के पुत्र भरत ने कुछ दूर आगे जाकर वेगवान् अश्वों से खींचे जानेवाले रथ से भी आगे जानेवाले अपने मन में (भावी के सम्बन्ध में) विचार करते हुए, अयोध्या के विशाल द्वार को देखा।
भरत ने उस नगर में उन दीर्घ ध्वजाओं को नहीं देखा, जो (ऐसी लगती थी) मानो वे सहस्रकिरण (सूर्य) के पीछे-पीछे चलकर उनसे यह कहती थीं कि तुम सारे ब्रह्माण्ड में घूमते-घूमते थक गये हो, (यहाँ किंचित् समय ठहरकर) विश्राम कर लो, तब जाओ, और उन (सूर्य) की गति को रोक लेती थीं।