कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 266, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| २५६ | कंब रामायण |
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तुरत भरत ने अपनी सेना को सन्नद्ध होने की आज्ञा दी और यह भी न विचार कर कि वह मुहूर्त्त यात्रा के लिए अच्छा है या नही, कैकेयराज को प्रणाम करके, उनकी आज्ञा लेकर, अपने भाई (शत्रुघ्न) के साथ घोडे जुते हुए रथ पर आसीन होकर चल पडे।
उस समय हाथी (भरत को) घेरकर चल पडे। रथ कोलाहल करते हुए साथ चल पड़े। बड़े महिमापूर्ण राजा लोग घेरकर चल पडे। करवाधारी पदाति-सेना चल पड़ी। शंख बज उठे। नगाड़े, मत्स्यों के निवास समुद्र के समान गरज उठे।
ध्वजाएँ एकत्र होकर निकली। निशान निकले। आम के टिकोरे-जैसे नयनों-वाली युवतियों के आरूढ होने योग्य हथिनियाँ चलीं। मेघों के गर्जन समय कौंधनेवाली बिजली के समान सर्वत्र आभरण चमक उठे।
अनेक रथों पर रखे गये विविध वाद्य बड़ी ध्वनि करने लगे। नारियों की पुष्प-मालाओं के भ्रमर झंकार भरने लगे। शर के समान वेगगामी अश्व मार्ग पर चलने लगे।
अपनी नासिका से साँस छोड़ते हुए बाँसुरी की-सी ध्वनि करनेवाले, मुख पर आभरणों से भूषित, गगन पर भी उड़ जानेवाले, निश्चित समय में कितनी भी दूर चले जानेवाले, झुकी हुई गरदनवाले अश्व चल पड़े।
धनुर्विद्या में निपुण, करवाल-युद्ध में चतुर, खड्ग-युद्ध में कुशल, मल्ल-युद्ध में प्रवीण, बर्च्छे, भाले आदि शस्त्रों के अभ्यासी योद्धा तथा पुराने हाथीवान भी घेरकर चले।
परस्पर टकरानेवाले भैंसे, बकरे, रक्त का चिह्न देखकर लड़ने को झपटनेवाले कुक्कुट, बाज, 'करुंपूलू' (नामक लड़नेवाला पक्षी-विशेष), 'कौदारी' (नामक लड़नेवाले पक्षी-विशेष) आदि को पालनेवाले जो कभी उत्तम मार्ग पर न चलनेवाले थे, ऐसे मनुष्य भी घेरकर चले।
भरत कहीं त्वरित गति से आगे न निकल जायें, इस आशंका से आतुर होकर विद्या, ज्ञान आदि से भरे हुए व्यक्ति आगे-आगे चलने लगे। इस प्रकार चलते हुए वे ऐसे लगते थे, जैसे शापवश इस धरती पर जन्म लिये हुए देवता सद्ज्ञान पाकर पुन. स्वर्ग को जा रहे हो।
बंदी-मागधों के मधुर गीत गगन को भरने लगे। जैसे प्राण शरीर में व्याप्त रहता है, उसी प्रकार मर्दल-ध्वनि सब गीतों में व्याप्त हो गई।
बजनेवाले नगाड़ों की ध्वनि से भी बढ़कर वेदज्ञ ब्राह्मणों के आशीर्वादों की ध्वनि थी। वृषभ-समान मल्ल-वीरों के गर्जन से भी बढ़कर बंदी-मागधों के स्तुति-पाठ की ध्वनि थी।
भरत सात दिन चलकर नदियों, काननों और विशाल पर्वतों को पारकर उस कौशल देश में जा पहुँचे, जहाँ गन्ने के कोल्हुओं से निकला हुआ रस नालों में, बाँध तोड़ता हुआ, वह चलता है और अंकुरों से भरे खेतों को भर देता है।
खेत हलों से शून्य थे। युवकों की भुजाएँ पुष्पमालाओं से शून्य थीं। शीतल धान के खेत पानी से शून्य थे। कमल में वास करनेवाली संपत्ति की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी उस देश को छोड़कर चली गई थीं।