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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 549 में से

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पृष्ठ 272
२६२भद्र रामायण

को अमूल्य रत्न-दण्ड का छत्र बना दिया—तो इससे बढ़कर प्रतिकूल बात और क्या हो सकती है?

तुमनें पतिव्रत्य नामक धर्म की सीमा को मिटा दिया। उस जगत्-प्रसिद्ध उत्कृष्ट ऐश्वर्य के तीस लक्षण धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती का तुमने नाश किया—और इस प्रकार के उन नव्बें। तीन लोगों को काटनेवाली नागिन हो। उस पर भी तुम कलङ्क कहती हो।

तुमने अपने पति के प्राण पी डाले। तुम कोई व्याधि नहीं हो, किन्तु पिशाचिनी हो। (भाव है, अगर व्याधि होती, तो वह शरीर से पृथक् होकर उस शरीर के साथ नष्ट होती है। पिशाचिनी शरीर के मिटाने के बाद भी जीवित रहती है। अतएव कैकेयी, पिशाचिनी-तुल्य है)। क्या तुम अब भी जीवित रहने योग्य हो, क्या पापिन हो जाओ। तुमने (पहले) मुझे अपना स्तन पिलाकर बड़ा किया। (उस समय अवकाश दिया। मेरी माँ बनी हुई तुम न जाने मुझे और क्या देनेवाली हो।

कभी असत्य न बोलनेवाले चक्रवर्त्ती को तुमने वचन से मार डाला। उस अपवाद पाकर भी तुमने राज्य प्राप्त करके सुखी जीवन व्यतीत करने का प्रयत्न किया। तुमने राम को अरण्य भेजकर गाय और उसके बछड़े को पृथक् कर दिया (अर्थात्, समस्त नगर के लोगों से पृथक् किया)। ऐसा करते हुए तुम्हारा मन किञ्चित् भी दुःखी नहीं हुआ।

चक्रवर्ती, अपने दिये हुए वरों को न टालकर स्वयं मर गये। ज्येष्ठ पुत्र अपने पिता की आज्ञा को ही धर्म मानकर वन चले गये। किंतु उन (राम) का छोटा भाई मैंने माता के षड्यन्त्र से संसार का राज्य प्राप्त किया, ऐसा अपयश पाना बड़ा कठिन है।

जिनको राज्य करने का अधिकार है, वे राम—यह न सोचकर कि उनके वन जाने से पिता प्राण त्याग देंगे और यह मानकर कि अपयश का पात्र बनेगा—किन्तु यह प्रतिकूल विचार मेरे ही (अर्थात्, भरत के ही) कारण उत्पन्न हुआ तथा निष्कण्टक राज्य करनेवाला हूँ—स्वयं वन को चले गये। यदि वे (राम) ऐसा नहीं मानते, तो वे कभी वन जाने का विचार नहीं करते।

प्रसिद्ध पुरातन कुल में उत्पन्न चक्रवर्ती का विचार जैसा भी रहा हो तथा (राम) यदि यह सोचें कि मेरी सेवा में निरत रहनेवाला भरत (मेरे प्रति) दुष्ट विचार रखता है, तो इसके लिए मेरी माता का राज्य माँगना ही पर्याप्त कारण है।

मेरे ज्येष्ठ भ्राता, वन में अपनी अञ्जलि-रूपी पात्र में शाक आदि वन्य फल-मूलों में क्रय बनकर अपना जीवन रखे हुए, उत्तम (स्वर्ण के) पात्र में श्रेष्ठ धान के पके हुए चावल अमृत समान घृत से सिक्त करके भोजन करता रहूँ? अहो! संसार के लोग मुझपर क्या आक्षेप नहीं सोचेंगे?

धनुर्भूषित कंधेवाले राम वन को चले गये—महा महाराज दशरथ चक्रवर्ती ने अपने प्राण छोड़ दिये। किन्तु विष-समान इस नारी की गोद में अपने को बिना जीवित रहनेवाली मैं ऐसे रो रहा हूँ, जैसे श्मशान-भूमि पर मुझे दफन करने के लिए कितने घोर अपयश का पात्र बन गया हूँ।