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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 549 में से

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पृष्ठ 273
अयोध्याकाण्ड२६३

मेरा राज्य करना लोग स्वीकार नही करेगे। मैं भी जैसे जीवन की इच्छा करके अपयश को स्वीकार नही करूँगा। इससे उत्पन्न होनेवाला अपयश किसी भी उपाय से नही मिटेगा। अधर्म से युक्त इस नगर मे लक्ष्मी निवास नही करेगी। अहो ! तुमने (यह सब उत्पात करने के लिए) किसके साथ मत्रणा की ? तुम्हे परामर्श देनेवाले कौन हैं ? धर्म का समूल नाश करके तुम्हे क्या मिला ?

तुम्हारे क्रूर वचन के द्वारा मैने अपने पिता को मारा (अर्थात्, पिता की मृत्यु का निमित्तकारण मै बना)। ज्येष्ठ भ्राता को अरण्य मे भेज दिया। अब संसार का राज्य करने के लिए आ उपस्थित हुआ हूँ। तुम पर क्या दोष डाले ? तुम्हारा क्या अपयश होगा ? पर क्या किसी दिन मेरा अपयश भी मिट सकेगा ?

अब लोग देखे कि मै क्या करने जा रहा हूँ। जबतक लोग (मेरे स्वभाव को) नही देखेगे, तबतक मेरी निन्दा करेंगे। किन्तु हे माता ! तुमने व्यर्थ अपवाद प्राप्त किया (जो किसी भी रूप मे नही मिटनेवाला है)। मेरा यह विचार है कि विष, बिना उसे खाये, किसी को नही मारता, इसलिए अबतक मैं जीवित हूँ। अन्यथा मै प्राण नही रखता (भाव यह है कि जिस प्रकार विष खाने पर ही मारता है, उसी प्रकार जब मै राज्य स्वीकार करूँ, तभी मेरा अपवाद होगा, अन्यथा नही)।

मै तुम्हारे पाप-पूर्ण नरक-तुल्य उदर में रहा—इससे जो पाप मुझे लगा है, उसे मिटाना है। इसलिए, सद्धर्म के देवता को साक्षी बनाकर, त्रिलोक के निवासियो के देखते हुए, मै घोर तपस्या करूँगा।

ज्ञानी लोगो के वचन को ही मै सुनता हूँ। यदि तुम अपने न मिटनेवाले प्राणो को त्याग दोगी, तो तुम्हारे कार्य बुद्धिपूर्वक किये गये ही माने जायेगे। उससे तुम पुनः शुद्ध बन जाओगी। ससार में जन्म लेने का लाभ तुम्हे मिलेगा। इसके अतिरिक्त तुम्हारे निस्तार का अन्य कोई उपाय नही है।

राम के अनुज (भरत) ने फिर यह कहकर कि मै अब अकथनीय क्रूरता से युक्त इस पापिन के निकट नही रहूँगा, अपनी अपूर्व मनोपीडा को मिटाने के लिए पवित्र स्वभाववाली कौशल्या के उत्तम चरणो को नमस्कार करूँगा, उठकर चले गये।

पौरुष से युक्त भरत कौशल्या के निकट जा पहुँचे। वहाँ जाकर धड़ाम से ऐसे गिरे, जैसे धरती फट गई हो और अपने उज्ज्वल करो से कौशल्या के कमल-जैसे चरणो को पकड़कर रोने लगे।

उस समय भरत ये वचन कहकर अश्रु बहाने लगे, जिसे देखकर स्वर्ग के निवासी भी रो उठे—मेरे पिता किस लोक मे गये हैं ? मेरे ज्येष्ठ भाई कहाँ गये हैं ? क्या यह सारा उत्पात देखने के लिए अकेला मैं ही आया हूँ ? हाय ! मेरे हृदय की इस वेदना को आप ही मिटाये।

भरत इस प्रकार लोट गये कि उनके कंधे धूलि से भर गये। वे बोले—मै अपने प्रभु (राम) के चरणो के दर्शन नही पा सका। क्या उन राम को जो इस पृथ्वी के स्वामी हैं, इस देश को छोड़कर जाना चाहिए था ? क्या आपने उनको वन जाने से रोका नही ? (आपने) यह भूल की।