कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 281, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २७१
यदि मैं उन (राम) को नहीं ले आ सकूँगा, तो दुर्गम अरण्य में रहकर यथाविधि कठोर तपस्या करूँगा। यदि और कोई बात कहकर आपलोग मुझे विवश करने का प्रयत्न करेंगे, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगा—इस प्रकार भरत ने कहा।
महिमा में श्रेष्ठ चक्रवर्त्ती (दशरथ) जीवित रहते समय भी प्रभु (राम) ने रत्नमय किरीट को धारण करना स्वीकार किया। किन्तु, हे उत्तमशील भरत ! तुम तो, पिता के स्वर्ग-गमन के कारण प्राप्त हुए राज्य को भी अस्वीकार कर रहे हो। राजकुल के पुत्रों में तुम्हारे समान (त्यागी) कौन है ?
आज्ञा-चक्र प्रवर्त्तित करना (अर्थात्, न्याय-पूर्ण शासन करना), धर्म की रक्षा करना, यज्ञ करना—इनके द्वारा तुम्हें अपना यश बढ़ाना आवश्यक नहीं है। चतुर्दश भुवन मिट जाने पर भी तुम्हारा बड़ा यश शाश्वत रहेगा—इस प्रकार कहकर उन सभासदों ने भरत को आशीर्वाद दिये।
भरत ने अपने अनुज (शत्रुघ्न) को बुलाकर कहा—मेघ-गर्जन के समान नगाड़े की ध्वनि करके, यह घोषणा कराओ कि इस राज्य के धार्मिक प्रभु (राम) को हम लौटा ले आनेवाले हैं और सारी सेना को यात्रा के लिए तैयार करो।
सद्गुण भरत की आज्ञा से शत्रुघ्न ने वैसी घोषणा करा दी, तब दुःख में डूबे हुए उस विशाल नगर के लोग यों आनन्द-घोष कर उठे कि मानो उनके प्राणहीन शरीरों पर वचनरूपी अमृत छिड़क दिया गया हो।
‘रामचन्द्र स्वर्णमुकुट धारण करनेवाले हैं’—यह घोषणा होते ही पंचेन्द्रियों का दमन करनेवाले मुनियों से लेकर सभी लोग महान् आनन्द से भर गये। (रामचन्द्र को लौटा लाने की) वह समाचार कानों के लिए दिव्य अमृत ही था।
‘भरत अपने ज्येष्ठ भ्राता को ध्वजाओं से अलंकृत नगर में ले आनेवाले हैं, उनको ले आने के लिए सेनाएँ भी जायेंगी’—नगाड़े बजा-बजाकर इस प्रकार की जो घोषणा की जा रही थी, वह उस वैभवपूर्ण अयोध्या नामक महा-समुद्र में चंद्र के उदय होने के समान थी।
वह बड़ी सेना युगान्त में उमड़नेवाले सप्त समुद्रों के समान उमड़ उठी और घोर शब्द करती हुई आगे बढ़ चली। उसमें कैकेयी की कामना समूल विनष्ट हो गई। नगर के लोग भी प्रेम से उमड़ उठे और उनका (रामचंद्र के वियोग से उत्पन्न) दुःख मिट गया।
अलंकारों से सजे हुए घोड़े, हाथी और रथ, धरती को ढककर छा गये। सेना की अत्युन्नत ध्वजाएँ आकाश-तल को ढककर छा गईं। ऊपर उठी हुई धूल कमलभव ब्रह्मा के भी नयनों को ढककर उन्हें अंधा बनाने लगी।
इन्द्रदेव जिस समय इस सृष्टि का अंत करता है, उस समय उठनेवाली ध्वनि से भी अधिक (भयंकर) ध्वनि उत्पन्न हुई। अकलंक रामचन्द्र के दर्शन करने के लिए उठनेवाली उमंग से भी अधिक उल्लसित होकर वह विशाल सेना उमड़ने लगी।
उस सेना का एक अति विशाल सूँड़वाला हाथी अपनी हथिनी के साथ इस प्रकार जा रहा था, मानो राज्य के जैसे ही उस नगर का त्याग कर विविध वृक्षों से