कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 282, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें२७२ || कम्ब रामायण
पूर्ण अरण्य की ओर सीता नामक लता को साथ लिये हुए रामचन्द्र-रूपी मेघ ही जा रहा हो।
कीचड मे उत्पन्न होनेवाले कमल-पुष्प भी जिनके सामने शोभाहीन हो जाये, जैसे मृदु चरणो से युक्त कन्याओ के साथ छोटी हथिनियाँ स्पर्धा करने लगी थी, किन्तु कदाचित् उन सुकुमारियो की मृदुगति से हारकर ही मानो वे (हथिनियाँ) उन सुन्दरियों को ढोये हुए जा रही थी।
वे दीर्घ ध्वजाएँ, जो मेघो के जल-बिदुओं से इस प्रकार सिंचित हो रही कि पीडादायक सूर्य-किरण भी उन (ध्वजाओ) से शीतल हो जाती थी, विजयमाला-भूषित धनुर्धारी राम के राज्याभिषेक का दर्शन न पाने से दुःखी हुई स्त्रियो के समान काँप रही थी।
असंख्य राजा लोग हाथियों पर आरूढ होकर इस प्रकार जा रहे थे, जैसे महिमामय उष्ण किरणो से युक्त सूर्य, असख्य रूप लेकर, अपने ऊपर धवल चन्द्रमा को (छत्र के रूप मे) धारण किये, मेघो पर आरूढ होकर, धरती पर उतरा हो और एक दिशा मे जा रहा हो।
एक समुद्र रथो पर जा रहा था। दूसरा समुद्र लाल चित्तियो से युक्त मुखवाले, मेघ-समान हाथियो पर जा रहा था। अन्य एक काला समुद्र सुन्दर घोडो पर जा रहा था और पदाति सेना-रूपी समुद्र धरती पर सर्वत्र छा गया था।
‘तारे’ (एक वाद्य), ताल, शख, शृङ्गी, चर्म से आवृत्त ‘पवे’ (नामक एक वाद्य), डमरू, भेरी तथा अन्य वाद्य भी उसी प्रकार मौन होकर जा रहे थे, जैसे मूर्खो के समुदाय में ज्ञानी पुरुष (मौन) रहते हैं।
चिरस्थायी लज्जा के अतिरिक्त शरीर से अन्य आभरणो को भी दूर किये हुए तथा अप्सराओ की भ्रान्ति उत्पन्न करनेवाली अति सुन्दरी स्त्रियाँ ऐसी लगती थीं, जैसी, पुष्पो के झड जाने पर, लताएँ हों।
उस सेना मे, गरजते समुद्र से घिरी सारी पृथ्वी का शासन करनेवाले (चक्रवर्ती दशरथ) का परपरा-प्राप्त श्वेतच्छत्र नही था। इसलिए वह सेना, अनेक छोटे-छोटे श्वेतच्छत्र-रूपी नक्षत्रो से युक्त होकर भी कलाओ से पूर्ण चन्द्रमा से रहित रात्रि के समान लगती थी।
वह सेना अपने विस्तार से दिशाओ को बहुत छोटी बना रही थी, ऐसी सेना को जब वह पृथ्वी वहन कर रही थी, तब गरजते समुद्र से आवृत्त इस भूमि को एक ‘स्त्री’ कहना क्या सत्य कथन हो सकता है ?
उन नारियों के, शीतल चन्दन, अगरु आदि से शून्य, कुकुम-लेप से रहित तथा मुक्ता-मालाओं से हीन, (प्रतिक्षण) बढनेवाले मृदुल स्तन किसी भी प्रसाधन से रहित होकर नारिकेल वृक्ष पर लगे हुए कोमल नारिकेल फलो के समान लगते थे।
यौवन से पूर्ण अपनी पत्नियो के स्तनो पर के चन्दन-लेप (के चिह्न) एव सुगन्धित पुष्प-मालाओं से शून्य (पुष्पो के) उन्नत कवे, घने लता-कुंजो तथा घाटी से शून्य पर्वतों के समान लगते थे।
सुगन्ध के सस्कार से शून्य केशोवाली नारियों की, नित्य के शृङ्गार अब न किये