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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

अयोध्याकाण्ड २७३

जाने के कारण, अञ्जन से अनलंकृत आँखें, युद्ध की समाप्ति पर रक्त को धो देने के पश्चात् यम के करवाल जैसी लग रही थी ।

नारियों के जघन-तट, मेखला की मणियो की झनझनाहट से शून्य होकर, घटियो से रहित रथो के समान लगते थे । भ्रमरो से शून्य कमल-पुष्पो के समान ही उन नारियों के अरुण पद भी नूपुर की ध्वनि से शून्य थे ।

नारियों की लचकनेवाली कटियाँ, पहनने योग्य मुक्ताहार आदि के न पहनने से, अब एक प्रकार (बोझ ढोने के काम) से विश्राम पाकर रहती थी, मानो कैकेयी को जो वर दिये गये थे, वे इन नारियों की कटि के लिए ही फलीभूत हुए हो ।

रामचन्द्र के वन चले जाने से शोभाहीन होकर कमल में निवास करनेवाली लक्ष्मी भी तपस्या करने लगी हो तथा मन्मथ भी अपार दुःख-सागर मे डूब गया हो—इसी प्रकार वह सेना भी शोभाहीन और विनोद एव हर्ष से रहित थी ।$^१$

‘वह सेना-भूमि, आकाश, प्रकाशमान दिशाएँ, इन सबको निगलने के लिए उमड़े हुए प्रलयकालिक समुद्र के समान थी’—ऐसा कहना क्या पर्याप्त होगा ? उसकी संख्या का विचार करें, तो यह ज्ञात होगा कि वह सृष्टिकर्त्ता की दृष्टि तथा मन से भी अधिक विशाल थी ।

वीचियो से भरे समस्त विशाल नदियो का जल, वह (सेना) पी सकती थी । वीचियो से भरे समुद्र के सारे जल को वह (सेना) पी सकती थी । वह धरती का संतुलन बनाये रखती थी । ऊँचे उठे हुए पर्वतों को भी अपने पद-भार से धरती मे दबा सकती थी । अतः, वह सेना द्रविड-महर्षि (अर्थात्, अगस्त्य) की समता करती थी ।

वह अयोध्या नगर आबालवृद्ध सब लोगों के तथा समस्त सेना के निकल जाने के कारण, अगस्त्य मुनि के द्वारा समस्त जल के पिये जाने पर समुद्र जैसा लगता था, वैसा ही शून्यता से भराहुआ पड़ा था ।

वह सेना, बड़ी वीचियो से भरी नदियों, खेतो, मनोहर वृक्षो, पर्वतो तथा सैकत श्रेणियो को देखती हुई, मार्ग पर जा रही थी । उस समय वह मार्ग अयोध्या की उस वीथी के समान लगता था, जिसकी सफाई नहीं की गई हो ।

मेघ के समान अति क्रोधी मत्त गजो के मदजल की गध के अतिरिक्त, उस सेना मे, पुष्प, चन्दन या अन्य कुंकुम-लेप आदि, किसी प्रकार की गध नही थी ।

जिस विशाल समुद्र को लोग बड़ी-बड़ी नौकाओ से पार करते है, उस (समुद्र) से भी विशाल उस सेना-रूपी समुद्र मे, उज्ज्वल ललाटवाली सुन्दरियों की कटि के अतिरिक्त, कंधे तक लटकनेवाले कुंडल या अन्य कोई आभरण प्रकाशमान विद्युत् केसमान नही चमक रहा था ।

सुन्दर मर्दल आदि वाद्यों की ध्वनि से हीन होकर चलनेवाली वह सेना विशाल भित्ति पर अंकित सेना के चित्र के समान लगती थी ।


१. वैभव की देवी लक्ष्मी हैं, और स्त्री-पुरुषों की क्रीडाओ का कारण मन्मथ का प्रभाव है। अब लक्ष्मी और मन्मथ के अपने-अपने कार्यों से विरत हो जाने से, उस सेना में न पुराना वैभव था, न स्त्री-पुरुषो की विनोद-क्रीड़ाएँ ही थी।—अनु०