कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 284, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें२७४ | कंब रामायण
विष्णु (के अवतारभूत राम) का वन-गमन भी क्या था ?—अयोध्या के युवकों के लिए, प्रफुल्ल पुष्पों की माला से विभूषित सुन्दरियों के कटाक्ष-रूपी बाण उन (पुरुषों) के हृदयों को छेदकर उनके प्राणों को पी न डाले—इसके लिए अपूर्व कवच बन गया था।
मन्मथ के पाँच बाणों से पीडित होनेवाले पुरुषों के हृदय अब पहले की तरह युवतियों के स्तनों पर आसक्त नहीं होते थे। स्वर्णमय कर्णाभरण से भूषित कैकेयी के प्रति उन (पुरुषों) के मन में जो क्रोधाग्नि उत्पन्न हुई थी, वह (दृष्टि के द्वारा प्रकट होकर) युवतियों के स्तनों को कहीं जला न डालें मानो यह सोचकर ही, उन पुरुषों की दृष्टि उनपर से हट गई थी।
इस प्रकार वह विशाल सेना जा रही थी। महिमा से पूर्ण भरत भी, अपनी सुन्दर कटि में वल्कल पहनकर अपने अनुज (शत्रुघ्न) से अनुसृत होते हुए, एक सुन्दर रथ पर बड़ी व्यथा के साथ बैठकर जाने लगे।
माताओं, तपस्वियों, पितृ-समान गौरव के योग्य वृद्ध मन्त्रिगण, असंख्य वधूगण, पवित्र स्वभाववाले ब्राह्मण-वर्ग—इन सब से अनुसृत होते हुए भरत अयोध्या-नगर के बहिर्भाग पर जा पहुंचे।
उस समय मन्थरा नामक उस यम (रूपिणी दासी) को भी चलनेवाले लोगों के मध्य धक्कामधुक्की करते हुए जाते देखकर शत्रुघ्न का क्रोध भड़क उठा और उन्होंने वेग से दौड़कर, गरजते हुए उसे पकड़कर झकझोरा। तब मनोहर कंधोंवाले भरत ने अपने अनुज को रोककर कहा—
कुल-परम्परा को तोड़कर अपनी कामना को पूर्ण करनेवाली माता को मैं टुकड़े-टुकड़े करके अपना क्रोध शान्त कर सकता था। किन्तु हे तात ! वैसा करने पर मुझे मेरे प्रभु (राम) त्याग देंगे—इसी विचार से चुप रह गया। मैंने उसे अपनी माता नहीं समझा।
अतः, हे दोषहीन सद्-अर्थों के प्रतिपादक शास्त्रों के ज्ञाता ! यद्यपि हम इस कुबड़ी से रुष्ट हैं, तो भी प्रभु हमारा यह कार्य पसन्द नहीं करेंगे। अतः इसे छोड़कर हम आगे बढ़ें। यों कहकर कठिनाई से शत्रुघ्न को समझाते हुए उन्हें अपने साथ लेकर वे आगे बढ़े।
समुद्र-जैसी उमड़ती हुई गज आदि की सेना तथा पदाति-सेना के साथ भरत उसी उपवन में जाकर ठहरे, जिसमें पहले (वन-गमन के समय) प्रभु (राम) अपनी पत्नी तथा सिंह-समान भाई के साथ ठहरे थे।
भरत उस रात्रि को, अपने नेत्रों से अश्रुजल का प्रवाह करते हुए ठहरे और पर्वत में उत्पन्न कन्द-फल आदि का आहार किया। धनुर्धारी रामचन्द्र ने जिस स्थान में विश्राम किया था, वही धूल पर घास बिछाकर भरत भी पड़े रहे।
पादपद्मवान् रामचन्द्र उस स्थान से पैदल ही मार्ग तय करते हुए गये थे। इस कारण से भरत भी वहाँ से पैदल ही चले और सारी अश्वों तथा गजों की सेना उनके पीछे-पीछे चली (१-५६)