कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 285, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ११
गुह पटल
मनोहर, स्वर्ण-निर्मित वीर-कंकण से भूषित तथा अनुपम सेना-वाहिनी से युक्त भरत, कावेरी नदी से सिंचित चोल देश की समता करनेवाले और उपजाऊ खेतों से भरे कोशल देश को छोड़कर गंगा नदी के तीर पर ऐसे दुःख के साथ आ पहुँचे कि उनको देख-कर स्थावर और जंगम—सब वस्तुएँ द्रवित हो उठीं।
उनकी सेवा में स्थित मत्त गजों का मद-जल अपार जल से पूर्ण गंगा में सर्वत्र बह चला, जिस कारण से वह गंगा-प्रवाह, असंख्य भ्रमरों के अतिरिक्त अन्य प्राणियों के पीने या स्नान करने के अनुपयुक्त हो गया।
उनकी सेना में स्थित अश्वों के खुरों से उठी हुई धूल उड़कर देवताओं के शिरों पर किस प्रकार छा गई, यह हम समझ नहीं सके। वे (अश्व) पानी पीते समय दीर्घकाल तक पानी पीते रहते और फिर लंबी श्वास छोड़ते, जल में उतरकर तैरते और धूल पर लोट जाते थे।
(पहले) गंगा का प्रवाह दूध के रंग से युक्त होकर गरजते हुए समुद्र में जा मिलता था, किन्तु अब वह पहले जैसे रंग से नहीं बह रहा था; क्योंकि पुष्पमाला से भूषित दीर्घ किरीटधारी भरत की सेना-रूपी समुद्र ने उस (गंगा के जल) को पी लिया था।
वन को गये हुए वीर (राम) का अनुसरण करके जानेवाले भरत के पीछे-पीछे जो सेना उस समय जा रही थी, वह साठ सहस्र अक्षौहिणी परिमाण की थी।
जब वह सेना गंगा के (उत्तरी) किनारे पर पहुँची, तब गुह उसे देखकर और यह सोचकर कि यह विशाल समुद्र के जल से भरे मेघ-समान प्रभु (राम) से युद्ध करने के लिए ही जा रही है, अत्यन्त क्रोध से भर गया।
गुह नामक यम-सदृश उस पराक्रमी व्यक्ति ने आकाश तक उड़नेवाली धूल से उस सेना की संख्या का अनुमान कर लिया। तब उस (गुह) की आँखों से चिनगारियाँ निकलीं। नासिका से धुआँ उठा। वह अट्टहास कर उठा। उसकी भौंहें ऐसे झुक गईं, जैसे युद्ध के उपयुक्त धनुष हों।
पाप करनेवाले सब प्राणियों के प्राणों का अंत करनेवाले, अपने कर में त्रिशूल धारण करनेवाले यम ने ही मानो पाँच लाख वीरों के रूप धारण किये हों—इस प्रकार के थे उस (गुह) की सेना के वीर। वह (गुह) धनुर्विद्या में निपुण था।
उस (गुह) ने अपनी कटि में कटार बाँध रखी थी। अपने ओंठ चबा रहा था। कठोर शब्द कह रहा था; उसकी घूरनेवाली आँखों से अग्नि-कण निकल रहे थे। उसकी सेना में डमरू बज रहे थे, शृङ्गी बज रहे थे और उसकी भुजाएँ यह सोचकर कि अब मुझे युद्ध करने का मौका मिला है (हर्ष से) फूल उठी थीं।
उस (गुह) ने यह कहते हुए कि 'यह सेना चूहों का झुंड है और मैं उनके लिए