कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें२७६ | कंब रामायण
विषधर सर्प हूँ'—बड़े कोलाहल से भरी अपनी सेना को पुकारा। वह सेना ऐसी थी, मानो तीक्ष्ण नखोंवाले समस्त घोर व्याघ्रों को एकत्र कर दिया गया हो।
बड़े कोलाहल से भरे और प्रलय-काल में गरजनेवाले मेघ तथा काले समुद्र ही उमड़ आये हों—इस प्रकार उमड़कर आनेवाली अपनी सेना को लेकर वह (गुह), समीप-स्थित (गंगा के) दक्षिणी तट पर आ पहुँचा।
अपने सैनिकों को देखकर गुह ने कहा—मैंने इस षड्यंत्रकारी सेना को वीर-स्वर्ग पहुँचाने तथा अपने प्यारे मित्र (राम) को महिमामय महान् राज्य देने का निश्चय किया है। तुम सब सहमत हो न ?
गुह ने फिर आज्ञा दी—पटहों को बजाओ। रास्तों तथा घाटों को सर्वत्र मिटा दो। एक भी नाव न चलाओ। सुगंध से पूर्ण गंगा-तट पर आनेवाले इन (भरत के) सैनिकों को पकड़ लो और काट डालो।
गुह ने आगे कहा—मेरे प्राणों के नायक, अंजनवर्ण प्रभु (राम) को राज्य से वंचित करके स्वयं (राज्य) लेनेवाले ये राजा यहाँ भी आ पहुँचे, हमारे अग्नि बरसानेवाले तीक्ष्ण बाण क्या इन लोगों पर नहीं चलेंगे? यदि ये मुझसे बचकर चले जायँगे, तो क्या संसार मुझे कुत्ता नहीं कहेगा?
क्या ये (भरत आदि), गंभीर विशाल और वीचियों से भरी इस (गंगा) नदी को पार करके जा सकेंगे? क्या मैं ऐसा धनुर्धर हूँ कि इनकी बड़ी गज-सेना को देखकर (डर से) भाग जाऊँगा? उन (राम) ने मुझ से मित्रता की जो बात कही थी, वह भी तो एक बात थी—(अर्थात्, राम का वह वचन आदरणीय है और मुझे मित्रधर्म का पालन करना है। यदि मित्रधर्म का पालन न करूँ, तो) क्या लोग मेरी निंदा यह कहकर नहीं करेंगे कि यह क्षुद्र निषाद मरा क्यों नहीं?
आह! इस (भरत) ने यह नहीं सोचा कि वे (राम) हमारे ज्येष्ठ भ्राता हैं। यह भी नहीं सोचा कि उनके साथ अति बलिष्ठ व्याघ्र-समान उनका भाई भी है। यदि उन्होंने ये बातें न सोची हों, तो न सही, किन्तु इसने मेरी उपेक्षा कैसे की? जो हो, इसका पराक्रम इस सीमा को पार करने पर ही तो ज्ञात होगा। क्या निषादों के द्वारा प्रयुक्त बाण गजाओं के वक्ष में नहीं लगते ?
क्या धरती पर राज्य करनेवाले ये क्षत्रिय, पाप, स्थिर रहनेवाला अपयश, शत्रु, मित्र (दूसरों को) दुःख देनेवाले कार्य—इनके बारे में विचार नहीं करते? जो हो, सो हो, मेरे अपूर्व प्राण-तुल्य मित्र (राम) पर इनका आक्रमण तभी तो हो सकता है, जब ये अपनी सेना तथा अपने प्राणों को (हम से बचाकर) अपने साथ ले जा सकें।
जब मेरे प्रिय मित्र (राम) अपूर्व तपस्या कर रहे हों, तब क्या यह (भरत) पृथ्वी का राज्य कर सकता है? (हमारे लिए) अपने प्राण कुछ अमर तो नहीं हैं? (भरत से युद्ध करके यदि मरना भी पड़े, तो) बड़ा यश पाकर मरूँगा। मेरे प्रति गंभीर प्रेम रखने-वाले प्रभु के साथ मैं जो वन में नहीं गया और यहीं रह गया, वह भी अच्छा ही हुआ। अब मैं अपना कर्तव्य पूरा करूँगा।