कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 287, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २७७
हाथियो और घोड़ो से भरी सेना से युक्त तथा सुगन्धित पुष्पमाला से भूषित इन ( भरत ) का शस्त्र-पराक्रम तो गंगा को पार करने के पश्चात् ही काम आयगा न १ तुम सब उग्र व्याघ्र यहाँ रहते हो। गंगा के घाटो पर नाव चलाना छोड़ दो। ( यदि आज हमे मरना भी पड़े, तो ) हमारे प्रभु ( राम ) से पहले ही ( युद्ध मे ) अपने प्राण छोड़ देना उचित ही तो होगा १
हमारे साथ आई हुई सेना के साथ एक बार युद्ध के लिए भी यह ( भरत की ) सेना पर्याप्त नही है, यह कहना अनावश्यक है। यदि देवताओ की सेना भी ( हमारे विरुद्ध ) आवे, तो भी हम अपने धनुष-रूपी काल-मेघो से शरो की वर्षा करके उनकी ( चिर स्थिर ) आँखो ( पलको ) को हिला देगे और करवाल से मारी गज-सेना को विध्वस्त कर देंगे। इस प्रकार, सबको अस्त-व्यस्त करके हरा देगे।
उस दिन (जब राम के राज्याभिषेक का निश्चय हुआ था) उदार, दानशील तथा मेरे प्रेम के पात्र प्रभु के पहनने के लिए जिस क्रूर कैकेयी ने वल्कल दिये थे, उसके इस पुत्र ( भरत ) की सेना को अपने शरीर से निहत करूँगा। चर्बी से भरे शवो की राशि को यह गगा नदी बहा ले जायगी और लहरो से भरी विशाल समुद्र मे डालकर उस समुद्र को पाट देगी।
'निषादो ने फहरानेवाली पताकाओ से युक्त (भरत की) सेना को विध्वस्त करके धर्मरूपी राम को ही शासन करने के लिए राज्य दे दिया'—ऐसा यश क्या हम नही पायेंगे। जिन प्रभु ( राम) ने अपना राज्य तक भरत को दे दिया था, वही भरत आज हमारे निवास-भूत इस अरण्य को भी देना नही चाहता और देखो, यहाँ भी चढ़ाई करने आया है।
'महान् तपस्वियो के बंधु होकर अरण्य मे निवास करनेवाले प्रभु ( राम ) क्रोध करेंगे'—यह विचार न करके यदि हम युद्ध-क्षेत्र मे इस ( भरत ) पर शर प्रयुक्त करेंगे, तो चाहे यह सेना सप्त समुद्रो के समान ही क्यो न हो, तो भी हम इसे उसी प्रकार मिटा देंगे, जिस प्रकार गाय अपने सामने की छोटी और कोमल घास को चबा डालती है।
दृढ तथा बड़े धनुष से युक्त, मल्ल-युद्ध मे निपुण भुजाओ से युक्त तथा युद्ध मे प्रवीण प्रभु ( राम ) के प्रति भक्ति से पूर्ण गुह ने लोहे के जैसे शरीरवाले अपने साथियो के प्रति ये वचन कहे। उसको वहाँ खड़े देखकर, दृढ रथ को चलानेवाले सुमंत्र ने सिह-समान बली भरत के निकट आकर कहा—
यह गंगा के दोनो तटों का नायक है। असंख्य नावों का स्वामी है। तुम्हारे वश मे उत्पन्न अनुपम पुरुष राम का प्राणप्रिय मित्र है। उन्नत भुजाओवाला ( वीर ) है, मल्ल-गज-तुल्य है। धनुर्धारी सेना-युक्त है। मधुस्रावी प्रफुल्ल पुष्पो की माला से भूषित है। इसका नाम गुह है।
हे बल की सीमा को देखनेवाली मनोहर तथा दीर्घ भुजाओ से युक्त ! हे नील-मेघ-सदृश नीलवर्ण ! यह पर्वत के जैसे दृढता से पूर्ण है। ( राम के प्रति ) असीम प्रेम से पूर्ण है। देखने मे, रात्रि की जैसी सुन्दर देह-काति से पूर्ण है। ऐसा यह हमारे मार्ग मे सम्मुख आकर खड़ा हुआ है। तुम्हे देखने की इच्छा रखकर आया है, यो सुमंत्र ने कहा।