कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें२७८ कंब रामायण
अपने पिता के मित्र सुमंत्र के द्वारा दूर पर अपने सामने खड़े गुह के विषय में सुनकर, कलंक-रहित भरत के मन में बड़ी उमंग उत्पन्न हुई। फिर, वे यह कहकर आगे बढ़े कि यदि यह प्रभु के आलिंगन का पात्र, प्रिय मित्र है, तो उसके यहाँ आने के पहले ही मैं स्वयं उसके पास जाकर (उससे) मिलूँगा।
यह कहकर वे उठे और अपने अनुज तथा उमड़ते हुए प्रेम के साथ गंगा के किनारे पर ऐसे जा पहुँचे, जैसे कोई पर्वत चला हो। किनारे पर आये हुए भरत को घने तथा काले केशोंवाले गुह ने देखा और उनकी दशा को पहचानकर वह चौंका।
गुह ने, वल्कल पहने हुए, धूल-भरी शरीरवाले, सुन्दर कलाहीन चंद्र-जैसे मंदहास की कांति से हीन वदनवाले तथा ऐसे शोक से पूर्ण कि जिसको देखकर पत्थर भी पिघल जाये, भरत को देखा। देखते ही उसके हाथ से धनुष खिसककर नीचे गिर पड़ा। वह व्याकुल हो उठा। स्तब्ध हो गया।
गुह ने सोचा, यह उत्तम पुरुष (भरत) मेरे प्रभु (राम) के जैसा ही लगता है। उसके पार्श्व में खड़ा हुआ कुमार (शत्रुघ्न) भी प्रभु के अनुज (लक्ष्मण) के जैसा ही है। इस (भरत) ने मुनि-वेष धारण किया है। इसके शोक की कुछ सीमा नहीं है। राम की दिशा में देखकर नमस्कार कर रहा है। अहो! क्या मेरे प्रभु के भाई कुछ दोष करनेवाले हो सकते हैं? (अर्थात्, नहीं होंगे)।
फिर गुह ने यह कहा—यह (भरत) गंभीर शोक से पीड़ित है। अचंचल प्रेम रखनेवाला है। (राम के) धारण किये मुनि-व्रत को स्वयं भी अपनाया है। मैं वहाँ जाकर इसके मनोभावों को समझकर लौट आता हूँ। तबतक तुम लोग घाटों की रक्षा करते हुए यहीं रहो और शीतल गंगा के घाट पर एकाकी ही एक नाव में बैठकर (भरत के निकट) आया।
सम्मुख (राम की दिशा में) खड़े रहकर प्रणाम करते हुए (भरत) के चरणों पर गुह नत हुआ। तब, उत्तम स्वभाववाले, सज्जनों के मन एवं शिर पर धारण किये जाने-वाले, पवित्र यशवाले तथा कमल-पुष्प पर आसीन ब्रह्मा के लिए भी वंदनीय उन (भरत) ने अपने चरणों पर पड़े (गुह) को उठाकर, (पुत्र से मिलनेवाले) पिता से भी अधिक आनंद के साथ उसका आलिंगन किया।
(भरत के द्वारा इस प्रकार) आलिंगित निषाद-पति ने, कमल-समान सुन्दर नयनोंवाले (भरत) से पूछा—हे प्रस्तर-स्तंभ-तुल्य भुजाओंवाले! किस प्रयोजन से तुम (यहाँ) आये हो? भरत ने उत्तर दिया—पृथ्वी की रक्षा करनेवाले मेरे पिता ने कुल-परंपरा के नियम का उल्लंघन किया। उस (अनियम) को दूर करने के लिए रामचन्द्र को लौटा ले जाने के उद्देश्य से मैं आया हूँ।
असत्य-रहित चित्तवाले किरातपति ने (यह वचन) सुना। सुनते ही उसने दीर्घ निःश्वास भरा। उसके मन में हर्ष उत्पन्न हुआ। उसकी देह फूल उठी। फिर, वह धरती पर गिर पड़ा और चित्र में अंकित करने के लिए दुस्साध्य रूपवाले भरत के चरण-कमलों को अपने करों से बाँधकर यह कहने लगा—