कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 289, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २७८
हे यशस्विन् ! ( तुम्हारी ) माता के वचन मानकर ( तुम्हारे ) पिता ने जो राज्य ( तुमको ) दिया, उसे पाप-कृत्य के समान मानकर तुमने ( उसे ) त्याग दिया और अपने मन में चिन्ता रखकर इस प्रकार यहाँ आये हो । तुम्हारे, इस समय का यह भाव देखने पर, क्या महत् रामचन्द्र भी तुम्हारी समता कर सकते हैं ?
हे उत्तम गुणशील तथा बलिष्ठ भुजाओंवाले ! मैं अज्ञ किरात तुम्हारी क्या प्रशंसा करूँ ? जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों के पुंज से अन्य ज्योतियों को मंद कर देता है, उसी प्रकार क्षत्रिय-समुदाय के द्वारा प्रशंसित तुम्हारे कुल के सब पूर्वजों की कीर्त्ति को भी तुमने अपनी कीर्त्ति में अंतर्भूत कर लिया ।
वीर-कंकण तथा मांस-गंध से युक्त शूल को धारण करनेवाले किरातपति ने इस प्रकार के उचित वचन कहकर भरत के प्रति अपना अनुपम प्रेम दिखाया । उन भरत के प्रति प्रेम न रखनेवाले भी क्या कोई हो सकते हैं ? ( रामचन्द्र के ) अचिंतनीय सद्गुणों के कारण ही तो गुह उन ( राम ) का भक्त बना था ।
करुणा के समुद्र-जैसे, सन्मार्ग पर चलनेवाले मन से युक्त भरत ने उस समय रामचन्द्र की दिशा की ओर देखकर नमस्कार किया और गुह से पूछा—हमारे ज्येष्ठ (राम) ने किस स्थान पर विश्राम किया था ? तब किरातपति ने कहा—हे वीर ! मैं ( वह स्थान ) तुम्हें दिखाऊँगा, चलो इस ओर ।
तब भरत मेघ के समान चलकर अतिशीघ्र वहाँ गये और पथरीली भूमि पर उस घास की शय्या को देखा, जिसपर रामचन्द्र ने विश्राम किया था । उसे देखते ही भरत तड़पकर गिर पड़े और अपने अश्रुजल से धरती का मंगल-स्नान कराया और शोक-समुद्र में डूब गये ।
( भरत कह उठे— ) जब मैंने यह सुना कि 'मेरे कारण तुमको यह वनवास का दुःख प्राप्त हुआ है,' तब मैंने अपने प्राण नहीं छोड़े । 'कंद और फलों को ही अमृत मानकर तुमने उनका भोजन किया'—यह सुनकर भी मैंने अपने प्राण नहीं छोड़े । 'दुःख देनेवाली घास की सेज पर तुम सोये'—यह जानकर भी मैंने प्राण नहीं छोड़े । अतः, उज्ज्वल रत्न-जटित मुकुट धारण करने के लिए भी कदाचित् मैं प्रस्तुत हो जाऊँ, तो इसमें आश्चर्य ही क्या होगा ?
स्तंभ-समान दृढ़ भुजाओंवाले भरत ने आगे कहा—यदि उन ( राम ) के विश्राम करने का स्थान यह था, तो कहो कि उनपर अत्यन्त भक्ति रखकर उनके साथ आये हुए अनुज ( लक्ष्मण ) ने कहाँ विश्राम किया ? तब किरातपति ने उत्तर दिया—
हे पर्वत-समान ऊँचे कंधोंवाले ! रात्रि के समान मनोहर वर्णवाले वे प्रभु तथा वह देवी यहाँ विश्राम करते रहे और वह वीर ( लक्ष्मण ) कर में धनुष लेकर निःश्वास भरते हुए और आँखों से अश्रु बहाते हुए रात्रि के व्यतीत होने तक, एक पलक भी मारे बिना, ( पहरे पर ) खड़े रहे ।
यह सुनकर भरत ने कहा—राम के अनुज बनकर एक समान उत्पन्न हुए हम-लोगों में से एक मैं हूँ, जो ( राम के लिए ) अपार कष्ट का कारण बना । और, एक वह