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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 290
२८०कंब रामायण

(लक्ष्मण) भी है, जो मेरे उत्पादित कष्टो को दूर करने के लिए सहायक बना । अहो। प्रेम की भी कोई सीमा हो सकती है ? मेरा दासत्व भी खूब रहा ।$^१$

फिर, भरत उस रात को वही धूल पर लेटे रहे । प्रातःकाल होने पर उन्होंने गुह से कहा—शत्रु-भयंकर नाद से युक्त वीर-वलय धारण करनेवाले हे वीर ! यदि तुम इस समय हमलोगो को गगा के उस किनारे पर पहुँचा दोगे, तो तुम हमे दुःख के समुद्र से निकालकर प्रभु (राम) के पास पहुँचानेवाले हो जाओगे ।

गुह भी 'अच्छा' कहकर अपने सैनिको के निकट गया और कहा कि तुमलोग शीघ्र जाकर नौकाएँ ले आओ। तब नौकाएँ इस प्रकार आईं, मानो शिवजी का कैलास, उनके द्वारा (धनुष के रूप में) झुकाया गया स्वर्ण-पर्वत मेरु एव कुवेर का पुष्पक विमान—ये तीनो एकाकी ही रहने से लज्जित होकर अब अनेक रूप धारण करके आ गये हो ।

उस किनारे से इस किनारे पर तथा इस किनारे से उस किनारे पर लोगो को ले जाने ओर ले आने के कारण वे नौकाएँ (पुण्य-पाप-रूपी), कर्म-युगल से समान थी, जो जीवो को इस लोक से स्वर्गलोक में तथा स्वर्गलोक से इस लोक में लाते-पहुँचाते रहते हैं। युवतियो की गति एव हसो (की गति) को लजाती हुई चलनेवाली वे नौकाएँ गगा नदी में सर्वत्र फैल गई ।

तब शृङ्गवेरपुराधीश (गुह) ने भरत से कहा—हे दृढ धनुर्धारी वीर । असख्य नौकाएँ आ गई हैं। अब आप क्या करना चाहते हैं ? तब सुन्दर धनुर्धारी भरत ने सुमत्र से कहा—इस सारी सेना को शीघ्र इन नौकाओ पर चढाकर उस पार ले चलो ।

भरत की आज्ञा से, अश्व-जुते बड़े रथ को चलाने में चतुर सुमंत्र ने, क्रम को तोडे बिना, पृथक्-पृथक् वर्गों में, गजो, अश्वों, रथो तथा पदाति सेना को उस पार पहुँचाया। वह सेनावाहिनी, उज्ज्वल रत्नो को अपनी वीचियो से विखेरनेवाली गंगा नदी के दूसरे किनारे पर जा पहुँची ।

प्रलय-काल में मानो मेघो के झुड गरजते हुए समुद्र के सारे जल को भरने के लिए उमड़ आये हो, अथवा जल-नौकाएँ ऊँची ध्वजा और मस्तूल के साथ (जल में) जा रही हो—इसी प्रकार दीर्घ शुडवाले मत्तगज, अपनी सूँड़ को ऊपर उठाये हुए जल में उत्तर-कर तैरते हुए नदी को पार कर गये ।

अति विशाल हाथियो के द्वारा ढकेला जाकर गगा का जल, शख, मकर, मीन, मुक्ता तथा अन्य रत्नो को विखेरता हुआ तट को लाँघकर दक्षिण की दिशा मे उमड़ चला, जिससे (दक्षिण का) समुद्र उसके मार्ग में निकट आ गया, मानो वह गगा-प्रवाह भी रामचन्द्र के दर्शन करने की इच्छा से ही चल रहा हो ।


१. अतिम वाक्य का यह भाव ह कि प्रेम का क्रियात्मक रूप ही दासत्व है। यह वैष्णवों का सिद्धात है। वात्सल्य, दापत्य, सत्य आदि का प्रेम भी क्रिया-रूप में दास्य ही है। अत', भरत यह कहत हैं कि मै राम के प्रति प्रेम रखकर भी उनका कुछ दास्य नही कर सका, जब कि लक्ष्मण दास्योचित कार्य कर रहा है । —अनु०