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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 291

अयोध्याकाण्ड २८१

( गङ्गा के प्रवाह में जब हाथी तैर रहे थे, तब ) अत्यन्त मदजल वहानेवाले मत्त-गजो के उन्नत कुंभ-मात्र ऊपर दिखाई दे रहे थे । गजो के शरीर के छिपे रहने से, तथा सुन्दर उत्तरीय-जैसी ही वीचियो के, उन कुंभो पर फहराने से, वे कुंभ ऐसे लगते थे, मानो गंगानदी-रूपी युवती के स्तन ही हो ।

रथो के चक्र, धुरी, छत, ध्वजाएँ, पीठ आदि उनके सब भाग पृथक्-पृथक् कर दिये गये । अश्व, तथा रथो के भाग, पृथक्-पृथक् नावो पर चढाये गये तथा दूसरे पार पहुँचाए गये । पुनः रथो के सब अंग जोड़े गये । वह ऐसा था, जैसे मनुष्य के शरीर के अंगों को अलग-अलग करके पुनः उन्हे जोड़नेवाली किसी विद्या के प्रभाव से उन्हें जोड़ दिया गया हो ।

जैसे दूध हो, वैसे ( उज्ज्वल ) शरीरवाले, जैसे भय ही घनीभूत हो गया हो, वैसे हृदयवाले—(अर्थात् , छोटी-सी ध्वनि से भी भड़ककर दौड़नेवाले), जैसे वायु ही घनीभूत हो गई हो, वैसी टाँगोवाले ( अति वेगगामी ) एवं लगाम लगे हुए आठ करोड़ घोडे, मीन जैसी नावो पर चढ़कर उस पार जा पहुँचे ।

कंकणो से भूषित पल्लव-समान करोवाली युवतियाँ, नावो में परस्पर मटकर और आमने सामने होकर, इस प्रकार बैठी थी कि उनके उभरे हुए स्तन परस्पर यो टकराने लगे, जैसे दीर्घ दंतोवाले मनोहर मत्तगजो के झुंड मे उनके दाँत टकरा उठे हो ।

जब वेग से चलती हुई नावें एक दूसरे से टकराकर हिल उठती थी, तब स्वर्ण-कर्णाभरणो से भूषित युवतियाँ भय से व्याकुल होकर दोनो ओर अपनी दृष्टि फेकती थी । वह दृश्य ऐसा था, मानो चञ्चल जल-तरंगो से फेके जाकर मीन घबराकर दोनो ओर उछल रहे हो ।

वेगगामी नावो के दोनो ओर खेवैयो के द्वारा चलाये जानेवाले डाँड़ो से जल-विन्दु उड़-उड़कर युवतियो के पतले वस्त्रो को भिंगो देते थे और उनके विस्तृत जघनो के आकार को प्रकट कर देते थे । वह दृश्य थके-माँदे वीरो की थकावट को मिटा देता था ।

कोलाहल भरी सेना को, इस किनारे से लेकर उस किनारे पर उतारकर खाली लौटनेवाली नावे उन बडे-बडे मेघो-जैसी लगती थी, जो ( मेघ ) समुद्र के जल को भरकर लाये हो और उसे बरसाने के पश्चात् खाली होकर समुद्र की ओर लौट रहे हो ।

अगरु-धूम के समान चुने हुए मयूर-पखों से भूषित दंड, मस्तूलो-जैसे लगत थे । मोती की लडी मे सजी हुई ध्वजाएँ, पाल-जैसी लगती थी । यो वे नावें विशाल जल-नौकाओ की समता करती थी ।

विशाल गङ्गा नदी आकाश के समान थी । उसमे बिखरनेवाले मोती नक्षत्रो के समान थे । कमल-सदृश वदन, अमृत, मधुर रक्त-अधर तथा ( पुष्पो के ) मधु से सिक्त केशोवाली विद्युत्-जैसी सुन्दरियो को ढोकर चलनेवाली नावें उन विमानो के समान थी, जो जल-विहार करके लौटनेवाली देव-स्त्रियो को लेकर चलते हैं ।

जल-बिन्दुओ को उड़ानेवाले डाँड़-समान अपने पैरो के साथ वे नावें, जो शीतल जलयुक्त गङ्गा नदी में चल रही थी, ऐसी लगती थी, मानो हर्ष-भरी, मोर-समान,