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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 305

अयोध्याकाण्ड २६५

राज्य करो—यो कहकर राम ने भरत के विशाल कमल-जैसे करो को अपने हाथो मे ले लिया ।

तब भरत ने कहा—यदि ऐसा हो, तो हे प्रभु ! चौदह वर्ष व्यतीत होते ही यदि आप भयकर परिखा से घिरे अयोध्या-नगर में आकर पृथ्वी का शासन नही संभालेंगे, तो मै प्रज्वलित अग्नि मे प्रविष्ट होकर अपने प्राण त्याग दूँगा ।

इस प्रकार कहकर भरत चिंता से विमुक्त हुए । अपने यश से भी महान् स्वभाव-वाले राम ने उन ( भरत ) की मानसिक दृढता को देखकर प्रेम से द्रवित होते हुए चित्त के साथ कहा—‘वैसा ही करूँगा ।’

भरत अब और कुछ न कह सके । रामचन्द्र से वियुक्त होकर जाना उनके लिए कठिन था । उन्होने व्याकुल होकर राम से प्रार्थना की कि आप कृपा करके अपनी पादुकाएँ मुझे दे । प्रभु ने भी समस्त सुखो को प्रदान करनेवाली अपनी पादुकाएँ भरत को दी ।

अश्रु बहानेवाले नेत्रो तथा धरती की धूलि से धूसर शरीर से युक्त भरत ने ( प्रभु की ) दोनो पादुकाओ को किरीट मानकर अपने शिर पर रख लिया । फिर, धरती पर गिरकर रामचन्द्र के प्रति साष्टाग प्रणाम करके लौट चले ।

माताएँ, असख्य बंधुजन, बड़े लोग, मुनिगण, विशाल सेना तथा अन्य सब लोग भरत के साथ चले और यज्ञोपवीत से शोभायमान कंधेवाले वसिष्ठ महर्षि भी चले ।

प्राचीन शास्त्रो के ज्ञाता भरद्वाज महर्षि लौट चले । परिखा से आवृत अयोध्या के निवासी लौट चले । आकाश-पथ मे एकत्र हुए सभी देवता लौट गये । मेघ-सदृश राम की आज्ञा लेकर गुह भी लौट चला ।

भरत ( प्रभु की ) पादुकाओ को शिर पर रखे, शीतल जल से युक्त गंगा को पार करके, पुष्पों की सुरभि से भरी अयोध्या मे न जाकर रात्रिकाल में भी निद्रा से विहीन हो—

नंदिग्राम नामक स्थान मे ऐसे रहने लगे, मानो प्रभु की पादुकाएँ ही शासन करती रही हो । भरत, रात-दिन अश्रु-विहीन न होनेवाली आँखों के साथ, मन से पंचेन्द्रियो का दमन करके वहाँ रहने लगे ।

उधर रामचन्द्र, यह विचार कर कि अयोध्या के निवासी, उनके चित्रकूट पर्वत पर रहने से प्रेम के कारण, बार-बार वहाँ आयेंगे, इसलिए अपने साथी अनुज लक्ष्मण तथा अपनी देवी के साथ (चित्रकूट को छोड़कर) दक्षिण दिशा में चल पड़े । ( १-१४१ )