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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

२६४ कंब रामायण

इस प्रकार (क्षीरसागर मे) शयन करते रहनेवाले, देवो को अमृत प्रदान करने-वाले समुद्र-जैसे नीलवर्ण विष्णु भगवान् की नाभि से एक शतदल (कमल) उत्पन्न हुआ, जिसमेंसे सारी सृष्टि करनेवाला ब्रह्मा उत्पन्न हुआ।

ब्रह्मा के द्वारा सृष्ट ससार की रक्षा के लिए तुम्हारे कुल का आदि पुरुष सूर्य उत्पन्न हुआ। उस सूर्य-कुल में अबतक कोई ऐसा राजा नही हुआ, जो न्याय से हटा हो। एक बात और सुनो।

हे मत्तगज-सदृश ! हित करनेवाले पाँच प्रकार के गुरुओ मे (अर्थात् माता, पिता, अध्यापक, राजा और ज्येष्ठ भ्राता इनमें) वही उत्तम गुरु होता है, जो इह और परलोक दोनो में सुख उत्पन्न करनेवाली शिक्षा प्रदान करता है (अर्थात्, आचार्य ही सर्वोत्तम गुरु हैं)।

(शास्त्रो मे) इसी प्रकार कहा गया है। मैने तुम्हे विविध विद्याएँ सिखाई हैं। अतः, हे तात ! इस समय मेरी आज्ञा का उल्लंघन मत करो। लौटकर राज्य का सुशासन करो—यो (वसिष्ठ ने) कहा।

यो कहनेवाले वसिष्ठ को अरुणनेत्र राम ने मुकुलित कमलों को शोभाहीन कर देनेवाली अपनी अंजलि से नमस्कार किया और कहा—हे मन पर दमन रखनेवाले ! हे ज्ञानी ! आपसे एक निवेदन है—

मधु बहानेवाले कमल पर आसीन ब्रह्मा के पुत्र ! चाहे कोई बड़े हों, गुरु हों। माता आदि हो, सत्य-परायण पुत्र हो, चाहे कोई भी हो, किसी के लिए भी मैं यह कार्य करूँगा—यो प्रतिज्ञा कर लेने पर उस प्रतिज्ञा को तोड़ना उचित नही है।

माता की आज्ञा को तथा पिता के द्वारा अनुमत कार्य को जो पुत्र पूर्ण नही करता है, उसके जैसा पापी बनकर रहने की अपेक्षा कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के ज्ञान से हीन श्वान बनकर सर्वत्र भटकते रहना अच्छा है।

पहले से ही माता-पिता की आज्ञा को मैने अपने शिर पर धारण कर लिया है। उसके पश्चात् अब आप दूसरी आज्ञा दे रहे हैं। हे महात्मन् ! अब मेरा कर्त्तव्य क्या है ? आप ही बतायें—यों राम ने वसिष्ठ से पूछा।

तब वसिष्ठ राम की प्रतिज्ञा के विरुद्ध कुछ नही कह सकने के कारण मौन हो रहें। उस समय भरत ने कहा—यदि ऐसी बात है, तो जो चाहे राज्य करे। मैं तो अपने ज्येष्ठ भाई के साथ ही इस भयंकर वन मे रहूँगा।

उस समय देवता लोग आकाश-पथ मे एकत्र होकर यह सोचने लगे कि यदि अब भरत रामचन्द्र को अयोध्या लौटा ले जायगा, तो हमारा कार्य पूर्ण नही होगा और फिर बोल उठे—

प्रशंसा के योग्य उत्तम गुणो से युक्त राम, पिता का वचन सुरक्षित करते हुए इस वन में रहे और भरत का कर्त्तव्य है कि वे चौदह वर्ष-पर्यंत, राज्य की रक्षा करें।

देवताओ के यो कहने पर राम ने भरत से कहा—यह वचन उपेक्षा करने योग्य नही है। मेरा भी तुम से यही आग्रह है। अब मेरी आज्ञा से तुम सुचारु रूप से पृथ्वी का