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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 303

अयोध्याकाण्ड २६३

क्या मेरे लिए यह उचित है कि पिता के वचन को भुलाकर वैभव तथा ऐश्वर्य- पूर्ण राजभोग का अनुभव करता हुआ शासन करूँ और उससे इस लोक में पिता को असत्य- वादी तथा परलोक में कठोर नरक-भोगी बना दूँ ?

‘पिता के दिये वर के अनुसार पृथ्वी का राज्य तुम्हारा है । तुम ( उस राज्य का निर्वाह करने योग्य ) शक्ति तथा सामर्थ्य से युक्त भी हो । अतः, राज्य तुम्हारा ही स्वत्व है, तुम राज्य करो’—राम ने जब यों कहा, तब भरत ने कहा—

यह पृथ्वी, जिसपर त्रिभुवन में भी अपनी समता न रखनेवाले आप मेरे ज्येष्ठ भ्राता बनकर अवतीर्ण हैं, यदि मेरी है, तो अब इसे मैंने आपको दिया। हे राजन् ! आप लौटकर मुकुट धारण करें ।

जब सारा संसार व्याकुल हो रहा है, तब स्तंभ-तुल्य भुजाओं से युक्त आपको क्या यह उचित है कि आप अपने मन के अनुसार कार्य करें ? अतः, संसार की व्याकुलता को शांत करते हुए लौट चलिए और ( संसार की ) रक्षा कीजिए, यों कहकर भरत ने रामचन्द्र के मनोहर चरणों को पकड़ लिया ।

तब राम ने भरत से कहा—मुझपर प्रेम होने के कारण यदि तुम संसार को मुझे सौंप दोगे, तो क्या वह न्याय-संगत होगा ? अपयश से डरकर पिता ने जो वर दिया, उसको मानकर जिस वनवास के लिए मैं आया हूँ, क्या ( अब राज्य स्वीकार करने से ) उस ( वनवास ) की अवधि पूरी हो जायगी ?

संसार में क्या सत्य के अतिरिक्त अन्य कोई पवित्र गुण है ? उस सत्य से दुर्गुण भी मिट जाते हैं, किन्तु सत्य से कुछ हानि नहीं होती है । तुम ठीक विचार कर देखो ।

पिता की आज्ञा के अनुसार मैं चौदह वर्ष वन में निवास करूँगा । तुम मेरी आज्ञा से इन चौदह वर्षों तक, सत्य से विचलित न होते हुए, पिता से दिये गये राज्य का पालन करो ।

चक्रवर्ती के जीवित रहते हुए भी यदि रत्नमय मुकुट को धारण करने के लिए मैं सहमत हुआ, तो वह पिता की आज्ञा का उल्लंघन न करने के लिए ही था । ( राज्य करने की इच्छा मुझे नहीं थी । ) मेरा उस प्रकार सहमत होने की बात जानकर भी तुम क्यों मेरी आज्ञा का पालन नहीं करना चाहते हो ? हे भ्राता ! दुःख को दूर करो । मेरे कथनानुसार कार्य करो । यों राम ने भरत से कहा ।

जब शोभा से पूर्ण रामचन्द्र ने ये वचन कहे, तब कुछ उत्तर देने के लिए उद्यत, समुद्र के समान गंभीर भरत को रोककर वसिष्ठ (राम से) बोले—हे उदारगुण ! तुम्हारे वंश में उत्पन्न कुछ प्राचीन राजाओं के आचरण के संबंध में तुम्हें सुनाता हूँ। उन्हें ध्यान से सुनो—

विष्णु ने पूर्वकाल में अनुपम वराह-रूप धारण करके, उमड़ते हुए समुद्र से अपने एकदंत के मध्य रखकर भूमि को यों उठाया कि वह बढ़ती हुई चंद्रकला के मध्य कलंक- जैसा दृश्य उपस्थित करने लगा।

पूर्व कल्प के अंत में, जब पंचमहाभूत अपने-अपने तत्त्वों में लीन हो गये, तब विष्णु, विस्तीर्ण जल को उत्पन्न करके उसपर ज्योति-रूप में निद्रित होने लगे ।