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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 549 में से

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पृष्ठ 302

२६२ | कम्ब रामायण

अनिष्ट उत्पन्न करनेवाले वरों को माँगकर जिस (कैकेयी) ने आपको, आपके लिए योग्य न होनेवाले इस अरण्य-वास में भेज दिया और चक्रवर्ती के लिए मृत्यु उत्पन्न की, उसी का तो पुत्र हूँ मैं। अतः, विचार करने पर, क्या यह वल्की-वेष मुझ-जैसे (पापी) के लिए उचित लगता है ?

संसार को दुःख देनेवाली पापिन का पुत्र होकर मैं उत्पन्न हुआ हूँ। मैंने अपने प्राण-त्याग देने का साहस नहीं किया। तपस्या करने योग्य भी नहीं रहा। अब इन अपयशों से किस प्रकार से मैं मुक्त हो सकूँगा ?

पातिव्रत्य से स्खलित स्त्रियों का शील, छूना-गुप से फिसले हुए तपस्वी का तप, कृपा से हीन हुआ धर्म—ये सब परंपरागत नीति से फिसले राजा के शासन से भी क्या गये-बीते हो सकते हैं ? नहीं (अर्थात् इन सबसे अधिक कठोर है नीति-रहित राजा का शासन)।

(चक्रवर्ती का ज्येष्ठ पुत्र होकर) संसार में उत्पन्न होकर भी आपने न त्यागने योग्य राजपद का त्यागकर बड़ा व्रत अपनाया है। तो क्या मैं भूल से भी, नीति से च्युत होकर, धर्म को करवाल से काटकर खाने के समान, वह राज्य स्वीकार करूँगा ?

(आपके प्रति) अपार प्रेम के कारण पिता मृत हुए। आप अति भयंकर धूप से पूर्ण वन में प्रविष्ट हुए। तो क्या मैं ऐसा शत्रु हूँ, जो षड्यंत्र करता हुआ, राज्य-हरण करने के लिए घात लगाये बैठा रहूँगा ?

हे हमारे प्रभु ! आपके पिता ने जो हानि की है तथा संसार को अति कठोर दुःख देनेवाली माता ने जो हानि की है—इन दोनों हानियों को दूर करते हुए आप अयोध्या वापस चलकर राज्य करें—यों भरत ने अपने मन के विचार प्रकट किये।

भरत के वचनों से उनके मन का निर्णय सुनकर रामचन्द्र ने सोचा—अहो ! इसका विचार कैसा है ! फिर बोले—हे विजयी वीर ! मेरा कथन सुनो और भली भाँति विचार करके ये वचन कहे—

हे तात ! सदाचार, सत्य, सबके लिए अनुसरणीय न्याय, उत्तम धर्म इत्यादि वंशों तथा शास्त्रों के अनुकूल चलनेवाले राजा के सुशासन में ही तो उत्पन्न होते हैं।

हे दृढ़ धनुर्धारी ! प्रशंसा के भाजन शास्त्रों का अध्ययन, दोषहीन ज्ञान, स्वार्थत्याग, उत्तम आचरण, ये सब वंदनीय गुरुजन ही हैं (अर्थात्, गुरुओं के कारण ही ये सब दृढ़ रहते हैं)।

हे प्यारे ! ये उत्तम गुरु कौन हैं ? यदि परिशुद्ध मन से विचार करके देखा जाय तो (विदित होगा कि) माता और पिता के अतिरिक्त अन्य (गुरु) कोई नहीं हैं।

शास्त्रों के ज्ञान से युक्त हे भाई ! माता ने वर माँगा। पिता ने भी आज्ञा दी। अपने उत्तम कुल की नीति के उपयुक्त कार्य ही मैंने किया। अब तुम्हारी प्रार्थना से इस कार्य को छोड़ना क्या उचित होगा ?

हे तात ! पुत्रों का कर्त्तव्य अपने कार्य से माता-पिता की कीर्त्ति को बढ़ाना होता है, या कभी न मिटनेवाला अपयश उत्पन्न करना होता है ?