भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 301

अयोध्याकाण्ड २६१

और मनोहर केशोंवाली सीता को देखकर कहा—हमारे पिता (दशरथ) मेरे चिरकाल के वियोग के कारण उत्पन्न शोक से मर गये।

यह सुनते ही सीता चौंककर काँपने लगी। उनकी दोनों विशाल आँखें समुद्र के समान जल बहाने लगी। भूमि नामक अपनी धाई के ऊपर हाथ रखे, संगीत-मधुर अपने कंठ-स्वर से अनेक वचन कहती हुई विलाप करने लगी।

पर्वत के समान पुष्ट भुजाओंवाले राम के पीछे-पीछे चलनेवाली सीता को अरण्य भी नगर के समान ही लगता था। अब यह सुनने से कि चक्रवर्ती मर गये, हंसिनी-जैसी वह सीता भी शोक-समुद्र में निमग्न हो गई।

उस समय दोष-रहित मुनियों की पत्नियों ने माताओं के समान होकर (प्रेम से) सीता को अपने हाथों से उठाकर संभाला। गंगा के पवित्र जल में स्नान कराया और उनके शोक को कम करके प्रभु (राम) के पास पहुँचाया।

तब सुमंत्र पुष्पमालाधारी चार उत्तम गुणवाले कुमारों को जन्म देनेवाली तीनों माताओं तथा जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों के तत्त्व को जाननेवाले गुरुजनों को साथ लिये, सदा धर्म का ही विचार करते रहनेवाले प्रभु (राम) के निकट हाथ जोड़े हुए आया।

सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा के भी आदिकारणभूत राम, यह कहते हुए कि 'मेरे पिता कहाँ हैं, बताइए'—वहाँ आई हुई उन माताओं के उज्ज्वल चरणों पर अपने अरुण नयनों से अश्रु बहाने लगे।

तब वे माताएँ राम को गले लगा-लगाकर रोने लगी। वहाँ एकत्र सेना के वीर एवं अप्सरा-समान स्त्रियाँ भी आग में पड़े मोम के जैसे पिघल उठीं।

फिर, राम आदि उन वीरों को जन्म देनेवाली वे माताएँ जनक की पुत्री का गाढ आलिंगन करके शोक-समुद्र में निमग्न हो गईं।

सेना के वीर, नगर के लोग, प्रेम से पीड़ित पूज्य, अन्य (स्त्री) जन, राजा लोग—सब दुःख से व्याकुल चित्त के साथ प्रभु (राम) के निकट आ पहुँचे।

शेष-शय्या पर शयन करनेवाले विष्णु ने जिस वंश को अपने अवतार का स्थान बनाया, उसके कुलपुरुष होने के कारण सूर्य भी, मानो अब (दशरथ की मृत्यु पर) स्वयं जल में स्नान करके तिलांजलि आदि देने का कर्त्तव्य पूर्ण करने जा रहा हो—यों सूर्य पश्चिमी समुद्र में निमग्न हुआ।

वह दिन बीत गया। दूसरे दिन जब राजा लोग, घनी जटा धारण किये मुनि लोग, वधुजन, अनुज-वर्ग (भरत आदि) सब एकत्र हुए, तब राम ने कहा—

हे भरत ! सबके अभीष्ट पूर्ण करनेवाले चक्रवर्ती मर गये। उनकी आज्ञा से सारी पृथ्वी तुम्हारी हुई है। तो तुमने किस कारण से मुकुट धारण किये बिना मुनि का वेष स्वीकार किया है ? कहो।

राम के यह कहने पर भरत, विकल मन के साथ उठे और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। अनेक क्षण तक प्रभु को देखकर फिर बोले—आपके अतिरिक्त धर्म-मार्ग पर स्थिर रहनेवाले और कौन हो सकते हैं ? ऐसे आप भी क्या धर्म से हट जाना चाहते हैं ?