कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| २६० | कंब रामायण |
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तपस्या, धर्म और सृष्टि एवं त्रिशूल, चक्र और सरस्वती, क्रमशः इनको धारण करनेवाले त्रिदेव (शिव, विष्णु और ब्रह्मा) भी काल के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं।
नेत्र आदि इंद्रियों के कारणभूत, अपार विशालता से युक्त एवं सृष्टि के सब पदार्थों के उत्पत्ति-स्थान बने हुए पृथ्वी, जल आदि पंचभूत भी नश्वर हैं, तो अब एक प्राणी के लिए तुम क्यों शोक करते हो ?
हे उत्तम ! पुण्य-रूपी सुगन्धपूर्ण तैल में अनुपम काल-रूपी बत्ती, विधि-रूपी ज्योति से दीप्त होकर जलती रहती है। जब तैल और बत्ती समाप्त होती हैं, तब दीप बुझ जाता है, इसमें कुछ संदेह नहीं।
ये विविध जन्म, इस लोक में दुःख भोगकर, परलोक में यातनाएँ भोगकर, फिर जन्मांतर में भी भाग्य का फल भोगने के स्थान हैं। इनकी गणना कैसे संभव है ?
सबके आदर-योग्य सद्गुणों से पूर्ण। तुम्हारे पिता बनने के कारण दशरथ कमलभव ब्रह्मा के लिए भी दुर्गम विष्णुलोक में जा पहुँचे। इसके अतिरिक्त तुम अपने पिता का और क्या उपकार कर सकते हो ?
हे तात ! तुम किंचित् भी दुःखी मत होओ। उन दशरथ के लिए इससे बढ़कर उद्धार का मार्ग अन्य कोई नहीं है। अब तुम शास्त्रोक्त प्रकार से उत्तरकृत्य करो तथा अपने अरुण करों से तिलांजलि आदि दो।
मेघ से गिरे हुए जल में जैसे बुद्बुद हो, वैसे ही इस नश्वर शरीर के बारे में सोचकर दुःख करना अज्ञान है। आँखों से आँसू बहाने से हम कुछ नहीं पाते हैं। अतः, अब तुम जाओ और कमल-समान अपने करों से पापहारी तथा पवित्रता उत्पन्न करनेवाला जल-तर्पण करो—यों वसिष्ठ ने कहा।
वसिष्ठ के यह कहने पर रामचन्द्र उठे तथा स्वर्ण के रंगवाली जटा से युक्त और चार वेदों के ज्ञाता वसिष्ठ के साथ घनी लहरों से भरी गंगा पर जा पहुँचे। वसिष्ठ के कथनानुसार राम ने (अपना दुःख शान्त करके) कर्त्तव्य का विचार किया।
सब जीवात्माओं में एक ही समान अंतरात्मा के रूप में रहकर उनकी ज्ञान देनेवाले विष्णु (के अवतार राम) ने, जल में उतरकर स्नान किया, वेदज्ञ वसिष्ठ के बताये ढंग से अपने कर से तीन बार जल लेकर छोड़ा।
जल-तर्पण करने के पश्चात् अन्य सब कृत्य पूर्ण करके राम, बडे मंत्रियों, राजाओं, महान् तपस्वियों तथा अन्य लोगों के साथ उस पर्णशाला में जा पहुँचे, जहाँ सीता देवी थी।
जब सब लोग पर्णशाला में पहुँचे, तब उत्तम भरत ने अकेली बैठी सीता देवी को देखा और उस पर्णकुटी को भी देखा। दुःख के आवेग से, अपनी कमल-जैसी आँखों को हाथों से आवृत्त करते हुए वे सीता देवी के चरणों पर गिरकर रोने लगे।
महत्ता से युक्त भरत की लाल आँखें शोक के उद्वेग के कारण अत्यधिक अश्रुओं को निरंतर बहाती रही, जिससे ऐसा लगा, मानों इन्द्रियों में भी वीचियों से पूर्ण समुद्र रहता हो।
उस प्रकार बड़े शोक से आहत वीर भरत को राम ने अपने दीर्घ करों से सँभाला