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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 299

अयोध्याकाण्ड २८६

स्वर्णरंग की धूलि बिखेरनेवाले पुष्पों से भूषित, तीक्ष्ण सूर्य-किरण की-सी उज्ज्वल कांति बिखेरनेवाली धवल माला धारण करनेवाले ! प्रजा का हित करनेवाले शासन का भार मेरे द्वारा लिये जाने पर विश्राम पाने का तुम्हारा ढंग क्या यही है ? मै तुम्हारे प्राणो के लिए यम बनकर उत्पन्न हुआ। क्या मै सचमुच ससार का राज्य करने की योग्यता रखता हूँ ?

शंबरासुर को मिटाकर देवेन्द्र को स्वर्ग का शाश्वत राज्य प्रदान करनेवाले हे चक्रधारी ! राज्य का भार मुझे सौंपकर पंचेन्द्रियो पर दमन करके तुम्हारी तपस्या करने की क्या यही रीति है ?

सबके स्पृहणीय राज्य को स्वीकार करके संसार के लिए दुःख उत्पन्न करनेवाला क्षुद्र हूँ मै। अब यदि मै अपने प्राण छोड़ने के बदले इस शरीर को रखकर राज्य करने लगूँ, तो वह किसकी तृप्ति के लिए होगा ?

पुष्ट देहवाले शत्रुओं के प्राण हरण करनेवाला भाला रखनेवाले, हे पिता। मधुस्रावी पुष्पोद्यानो से पूर्ण कोशल देश को छोड़कर मै वन में आया हूँ—यह बात सुनने मात्र से उसे न सहकर तुम स्वर्ग को चले गये। किन्तु, मै अभी तक यह (संसार का) जीवन चाहता हुआ जीवित हूँ।

गरिमामय चन्द्र को भी शीतलता प्रदान करनेवाले अनुपम छत्र से युक्त हे चक्रवर्ती ! तुम दातृत्व, गौरव, स्वर्गवासियो के लिए भी अविनाशी पराक्रम, न्याय से विचलित न होनेवाली शासन-रीति, अपरिवर्तनीय सत्य तथा अन्य समस्त सद्गुणों को अपने साथ ही ले गये (अर्थात्, अब इस संसार मे वे गुण नही रहे)।

इस प्रकार, विविध वचन कहकर विलाप करनेवाले, पुष्ट पर्वताकार दृढ कंधोंवाले, सिंहतुल्य राम को विशाल भुजाओवाले भाइयों तथा वहाँ आये हुए नरेशों ने जाकर सँभाला। तब महान् तपस्वी वसिष्ठ उन्हे सांत्वना देनेवाले वचन कहने लगे।

उस समय, वर्णनातीत तपःप्रभाव से युक्त भरद्वाज आदि जटाधारी मुनि, सप्त द्वीपो के राजा तथा सभी मंत्री आ पहुँचे। सेनापति भी आ गये।

आने योग्य सब लोगो के आ जाने पर शोक में निमग्न विजयशील पुरुषोत्तम (राम) को देखकर कमलभव (ब्रह्मा) के पुत्र (वसिष्ठ) ने कहा—

संसार के प्राणियो के लिए, संन्यास अथवा (गृहस्थ-जीवन मे रहकर) उत्तम धर्म-मार्ग पर चलना—इनके अतिरिक्त अन्य कोई साथी नही है। इन प्राणियो के लिए जन्म लेना और मरना स्वाभाविक है। वेदों के पारंगत तुमने क्या इस बात को भुला दिया ?

'प्राणियों के अनित्य जन्म असंख्य कोटि होते हैं, जो सुख और दुःख से भरे रहते हैं'—शास्त्रों में अनेक स्थानो मे प्रतिपादित इस सत्य को जानने के पश्चात् भी क्या यह सोचना उचित है कि यम पक्षपात से काम करता है ?

हम देखते हैं कि कुछ प्राणी जन्म लेने के पूर्व ही मर जाते हैं। चक्रवर्ती उत्तम ज्ञान के साथ, साठ सहस्र वर्ष-पर्यन्त सारी पृथ्वी का शासन करके स्वर्गवास करने गये हैं। इसके लिए रोना क्या ?