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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 298

२८८ | कंब रामायण

यह सुनकर लक्ष्मण-तपोवेष में, निर्बल हुई भुजाओं से युक्त भरत के संबंध में अपने कहे हुए कठोर वचन भूल गये। उनका क्रोध तथा ज्ञान भी शिथिल हो गये और कांति-हीन वदन के साथ यों खड़े रहे कि उनका धनुष तथा अश्रु दोनों धरती पर गिर पड़े।

उस समय, भरत अपने दोनों हाथों को जोड़कर इस प्रकार राम के सम्मुख आये, मानो रामचन्द्र को, अपने पति के रूप में पाने के लिए तपस्या करके उन्हें प्राप्त करने के समय अकस्मात् उनसे वियुक्त हुई राज्यलक्ष्मी का (राम के पास) भेजा हुआ कोई दूत हो।

भरत आये और जैसे अपने पिता के ही दर्शन कर रहे हों—यह वचन कहते हुए राम के चरणों पर गिर पड़े कि आपने धर्म का विचार नहीं किया। करुणा को त्याग दिया और परंपरागत नीति को छोड़ दिया।

उसमें प्राण हैं या नहीं, ऐसा संदेह उत्पन्न करनेवाले, अत्यन्त कृशगात हुए, भरत को प्रभु ने देखा। देखते ही उनके नयन-रूपी कमलों से (अश्रु) जल प्रवाहित होकर (भरत के) जटा-मंडल पर गिरकर उसे भरकर फिर उमड़कर वह चला।

दयामय परमात्मा ने धर्म-देवता का आलिंगन किया हो, इस प्रकार (का भ्रम उत्पन्न करते हुए) समस्त नीति के एकमात्र आश्रयभूत रामचन्द्र ने निःश्वास भरते हुए तथा वक्ष पर आँसुओं को बहाते हुए द्रवितचित्त होकर भरत का आलिंगन किया।

भरत को गले लगाकर रामचन्द्र ने उनके वेष को बार-बार ध्यान से देखा और विविध भाँति के विचार किये। फिर पूछा—हे तात! तुम दुःख-समुद्र में डूबे हो। संसार का शासन करनेवाले, मल्लयुद्ध में चतुर भुजाओंवाले, हमारे पिता सुखी हैं न?

ज्ञानी (प्रभु) का वचन सुनकर भरत ने कहा—हे प्रभु! आपके विरह-रूपी व्याधि से एवं मेरी जननी के वर-रूपी यम से पीड़ित होकर हमारे पिता इस संसार में सत्य को स्थिर करके परलोक में जा पहुँचे हैं।

'(पिता) स्वर्गलोक को गये'—यह तीक्ष्ण वचन घाव में वरछे के समान उनके कानों में घुसने के पूर्व ही परमपद के निवासी प्रभु (विष्णु के अवतार राम) के नयन और मन चरखी के जैसे घूम उठे और वे मूर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़े।

प्रभु विशाल धरती पर गिरे। उनके प्राण अप्रकट हो रहे। बिजली से पीड़ित सर्प के समान वे मूर्च्छित हो रहे। फिर, बड़ी कठिनाई से उनके प्राण लौटे। तब वे निःश्वास भरते हुए बड़ी व्याकुलता के साथ विविध वचन कहकर विलाप करने लगे।

अमंद दीप-सदृश हे शासक! संसार के निवासियों के लिए पितृ-तुल्य! अनुपम धर्म के लिए माता बननेवाले। दया-निलय। मेरे पिता! शत्रुरूपी हाथियों के लिए सिंह बननेवाले। तुम मृत हो गये। अब सत्य का यथार्थ आश्रय और कौन बनेगा?

हे शत्रुओं के लिए भयकर, विध्वंसक तथा विजयमाला से भूषित तीक्ष्णमाला धारण करनेवाले! प्रसिद्ध तपस्वी ऋष्यशृंग की कृपा से उत्तम यज्ञ संपन्न करके तुमने मुझे पुत्र के रूप में पाया। क्या उसका फल तुम्हारा इस प्रकार से प्राण त्याग करके जाना ही है?