कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
२८८ | कंब रामायण
यह सुनकर लक्ष्मण-तपोवेष में, निर्बल हुई भुजाओं से युक्त भरत के संबंध में अपने कहे हुए कठोर वचन भूल गये। उनका क्रोध तथा ज्ञान भी शिथिल हो गये और कांति-हीन वदन के साथ यों खड़े रहे कि उनका धनुष तथा अश्रु दोनों धरती पर गिर पड़े।
उस समय, भरत अपने दोनों हाथों को जोड़कर इस प्रकार राम के सम्मुख आये, मानो रामचन्द्र को, अपने पति के रूप में पाने के लिए तपस्या करके उन्हें प्राप्त करने के समय अकस्मात् उनसे वियुक्त हुई राज्यलक्ष्मी का (राम के पास) भेजा हुआ कोई दूत हो।
भरत आये और जैसे अपने पिता के ही दर्शन कर रहे हों—यह वचन कहते हुए राम के चरणों पर गिर पड़े कि आपने धर्म का विचार नहीं किया। करुणा को त्याग दिया और परंपरागत नीति को छोड़ दिया।
उसमें प्राण हैं या नहीं, ऐसा संदेह उत्पन्न करनेवाले, अत्यन्त कृशगात हुए, भरत को प्रभु ने देखा। देखते ही उनके नयन-रूपी कमलों से (अश्रु) जल प्रवाहित होकर (भरत के) जटा-मंडल पर गिरकर उसे भरकर फिर उमड़कर वह चला।
दयामय परमात्मा ने धर्म-देवता का आलिंगन किया हो, इस प्रकार (का भ्रम उत्पन्न करते हुए) समस्त नीति के एकमात्र आश्रयभूत रामचन्द्र ने निःश्वास भरते हुए तथा वक्ष पर आँसुओं को बहाते हुए द्रवितचित्त होकर भरत का आलिंगन किया।
भरत को गले लगाकर रामचन्द्र ने उनके वेष को बार-बार ध्यान से देखा और विविध भाँति के विचार किये। फिर पूछा—हे तात! तुम दुःख-समुद्र में डूबे हो। संसार का शासन करनेवाले, मल्लयुद्ध में चतुर भुजाओंवाले, हमारे पिता सुखी हैं न?
ज्ञानी (प्रभु) का वचन सुनकर भरत ने कहा—हे प्रभु! आपके विरह-रूपी व्याधि से एवं मेरी जननी के वर-रूपी यम से पीड़ित होकर हमारे पिता इस संसार में सत्य को स्थिर करके परलोक में जा पहुँचे हैं।
'(पिता) स्वर्गलोक को गये'—यह तीक्ष्ण वचन घाव में वरछे के समान उनके कानों में घुसने के पूर्व ही परमपद के निवासी प्रभु (विष्णु के अवतार राम) के नयन और मन चरखी के जैसे घूम उठे और वे मूर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़े।
प्रभु विशाल धरती पर गिरे। उनके प्राण अप्रकट हो रहे। बिजली से पीड़ित सर्प के समान वे मूर्च्छित हो रहे। फिर, बड़ी कठिनाई से उनके प्राण लौटे। तब वे निःश्वास भरते हुए बड़ी व्याकुलता के साथ विविध वचन कहकर विलाप करने लगे।
अमंद दीप-सदृश हे शासक! संसार के निवासियों के लिए पितृ-तुल्य! अनुपम धर्म के लिए माता बननेवाले। दया-निलय। मेरे पिता! शत्रुरूपी हाथियों के लिए सिंह बननेवाले। तुम मृत हो गये। अब सत्य का यथार्थ आश्रय और कौन बनेगा?
हे शत्रुओं के लिए भयकर, विध्वंसक तथा विजयमाला से भूषित तीक्ष्णमाला धारण करनेवाले! प्रसिद्ध तपस्वी ऋष्यशृंग की कृपा से उत्तम यज्ञ संपन्न करके तुमने मुझे पुत्र के रूप में पाया। क्या उसका फल तुम्हारा इस प्रकार से प्राण त्याग करके जाना ही है?
अयोध्याकाण्ड २८६
स्वर्णरंग की धूलि बिखेरनेवाले पुष्पों से भूषित, तीक्ष्ण सूर्य-किरण की-सी उज्ज्वल कांति बिखेरनेवाली धवल माला धारण करनेवाले ! प्रजा का हित करनेवाले शासन का भार मेरे द्वारा लिये जाने पर विश्राम पाने का तुम्हारा ढंग क्या यही है ? मै तुम्हारे प्राणो के लिए यम बनकर उत्पन्न हुआ। क्या मै सचमुच ससार का राज्य करने की योग्यता रखता हूँ ?
शंबरासुर को मिटाकर देवेन्द्र को स्वर्ग का शाश्वत राज्य प्रदान करनेवाले हे चक्रधारी ! राज्य का भार मुझे सौंपकर पंचेन्द्रियो पर दमन करके तुम्हारी तपस्या करने की क्या यही रीति है ?
सबके स्पृहणीय राज्य को स्वीकार करके संसार के लिए दुःख उत्पन्न करनेवाला क्षुद्र हूँ मै। अब यदि मै अपने प्राण छोड़ने के बदले इस शरीर को रखकर राज्य करने लगूँ, तो वह किसकी तृप्ति के लिए होगा ?
पुष्ट देहवाले शत्रुओं के प्राण हरण करनेवाला भाला रखनेवाले, हे पिता। मधुस्रावी पुष्पोद्यानो से पूर्ण कोशल देश को छोड़कर मै वन में आया हूँ—यह बात सुनने मात्र से उसे न सहकर तुम स्वर्ग को चले गये। किन्तु, मै अभी तक यह (संसार का) जीवन चाहता हुआ जीवित हूँ।
गरिमामय चन्द्र को भी शीतलता प्रदान करनेवाले अनुपम छत्र से युक्त हे चक्रवर्ती ! तुम दातृत्व, गौरव, स्वर्गवासियो के लिए भी अविनाशी पराक्रम, न्याय से विचलित न होनेवाली शासन-रीति, अपरिवर्तनीय सत्य तथा अन्य समस्त सद्गुणों को अपने साथ ही ले गये (अर्थात्, अब इस संसार मे वे गुण नही रहे)।
इस प्रकार, विविध वचन कहकर विलाप करनेवाले, पुष्ट पर्वताकार दृढ कंधोंवाले, सिंहतुल्य राम को विशाल भुजाओवाले भाइयों तथा वहाँ आये हुए नरेशों ने जाकर सँभाला। तब महान् तपस्वी वसिष्ठ उन्हे सांत्वना देनेवाले वचन कहने लगे।
उस समय, वर्णनातीत तपःप्रभाव से युक्त भरद्वाज आदि जटाधारी मुनि, सप्त द्वीपो के राजा तथा सभी मंत्री आ पहुँचे। सेनापति भी आ गये।
आने योग्य सब लोगो के आ जाने पर शोक में निमग्न विजयशील पुरुषोत्तम (राम) को देखकर कमलभव (ब्रह्मा) के पुत्र (वसिष्ठ) ने कहा—
संसार के प्राणियो के लिए, संन्यास अथवा (गृहस्थ-जीवन मे रहकर) उत्तम धर्म-मार्ग पर चलना—इनके अतिरिक्त अन्य कोई साथी नही है। इन प्राणियो के लिए जन्म लेना और मरना स्वाभाविक है। वेदों के पारंगत तुमने क्या इस बात को भुला दिया ?
'प्राणियों के अनित्य जन्म असंख्य कोटि होते हैं, जो सुख और दुःख से भरे रहते हैं'—शास्त्रों में अनेक स्थानो मे प्रतिपादित इस सत्य को जानने के पश्चात् भी क्या यह सोचना उचित है कि यम पक्षपात से काम करता है ?
हम देखते हैं कि कुछ प्राणी जन्म लेने के पूर्व ही मर जाते हैं। चक्रवर्ती उत्तम ज्ञान के साथ, साठ सहस्र वर्ष-पर्यन्त सारी पृथ्वी का शासन करके स्वर्गवास करने गये हैं। इसके लिए रोना क्या ?
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तपस्या, धर्म और सृष्टि एवं त्रिशूल, चक्र और सरस्वती, क्रमशः इनको धारण करनेवाले त्रिदेव (शिव, विष्णु और ब्रह्मा) भी काल के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं।
नेत्र आदि इंद्रियों के कारणभूत, अपार विशालता से युक्त एवं सृष्टि के सब पदार्थों के उत्पत्ति-स्थान बने हुए पृथ्वी, जल आदि पंचभूत भी नश्वर हैं, तो अब एक प्राणी के लिए तुम क्यों शोक करते हो ?
हे उत्तम ! पुण्य-रूपी सुगन्धपूर्ण तैल में अनुपम काल-रूपी बत्ती, विधि-रूपी ज्योति से दीप्त होकर जलती रहती है। जब तैल और बत्ती समाप्त होती हैं, तब दीप बुझ जाता है, इसमें कुछ संदेह नहीं।
ये विविध जन्म, इस लोक में दुःख भोगकर, परलोक में यातनाएँ भोगकर, फिर जन्मांतर में भी भाग्य का फल भोगने के स्थान हैं। इनकी गणना कैसे संभव है ?
सबके आदर-योग्य सद्गुणों से पूर्ण। तुम्हारे पिता बनने के कारण दशरथ कमलभव ब्रह्मा के लिए भी दुर्गम विष्णुलोक में जा पहुँचे। इसके अतिरिक्त तुम अपने पिता का और क्या उपकार कर सकते हो ?
हे तात ! तुम किंचित् भी दुःखी मत होओ। उन दशरथ के लिए इससे बढ़कर उद्धार का मार्ग अन्य कोई नहीं है। अब तुम शास्त्रोक्त प्रकार से उत्तरकृत्य करो तथा अपने अरुण करों से तिलांजलि आदि दो।
मेघ से गिरे हुए जल में जैसे बुद्बुद हो, वैसे ही इस नश्वर शरीर के बारे में सोचकर दुःख करना अज्ञान है। आँखों से आँसू बहाने से हम कुछ नहीं पाते हैं। अतः, अब तुम जाओ और कमल-समान अपने करों से पापहारी तथा पवित्रता उत्पन्न करनेवाला जल-तर्पण करो—यों वसिष्ठ ने कहा।
वसिष्ठ के यह कहने पर रामचन्द्र उठे तथा स्वर्ण के रंगवाली जटा से युक्त और चार वेदों के ज्ञाता वसिष्ठ के साथ घनी लहरों से भरी गंगा पर जा पहुँचे। वसिष्ठ के कथनानुसार राम ने (अपना दुःख शान्त करके) कर्त्तव्य का विचार किया।
सब जीवात्माओं में एक ही समान अंतरात्मा के रूप में रहकर उनकी ज्ञान देनेवाले विष्णु (के अवतार राम) ने, जल में उतरकर स्नान किया, वेदज्ञ वसिष्ठ के बताये ढंग से अपने कर से तीन बार जल लेकर छोड़ा।
जल-तर्पण करने के पश्चात् अन्य सब कृत्य पूर्ण करके राम, बडे मंत्रियों, राजाओं, महान् तपस्वियों तथा अन्य लोगों के साथ उस पर्णशाला में जा पहुँचे, जहाँ सीता देवी थी।
जब सब लोग पर्णशाला में पहुँचे, तब उत्तम भरत ने अकेली बैठी सीता देवी को देखा और उस पर्णकुटी को भी देखा। दुःख के आवेग से, अपनी कमल-जैसी आँखों को हाथों से आवृत्त करते हुए वे सीता देवी के चरणों पर गिरकर रोने लगे।
महत्ता से युक्त भरत की लाल आँखें शोक के उद्वेग के कारण अत्यधिक अश्रुओं को निरंतर बहाती रही, जिससे ऐसा लगा, मानों इन्द्रियों में भी वीचियों से पूर्ण समुद्र रहता हो।
उस प्रकार बड़े शोक से आहत वीर भरत को राम ने अपने दीर्घ करों से सँभाला
अयोध्याकाण्ड २६१
और मनोहर केशोंवाली सीता को देखकर कहा—हमारे पिता (दशरथ) मेरे चिरकाल के वियोग के कारण उत्पन्न शोक से मर गये।
यह सुनते ही सीता चौंककर काँपने लगी। उनकी दोनों विशाल आँखें समुद्र के समान जल बहाने लगी। भूमि नामक अपनी धाई के ऊपर हाथ रखे, संगीत-मधुर अपने कंठ-स्वर से अनेक वचन कहती हुई विलाप करने लगी।
पर्वत के समान पुष्ट भुजाओंवाले राम के पीछे-पीछे चलनेवाली सीता को अरण्य भी नगर के समान ही लगता था। अब यह सुनने से कि चक्रवर्ती मर गये, हंसिनी-जैसी वह सीता भी शोक-समुद्र में निमग्न हो गई।
उस समय दोष-रहित मुनियों की पत्नियों ने माताओं के समान होकर (प्रेम से) सीता को अपने हाथों से उठाकर संभाला। गंगा के पवित्र जल में स्नान कराया और उनके शोक को कम करके प्रभु (राम) के पास पहुँचाया।
तब सुमंत्र पुष्पमालाधारी चार उत्तम गुणवाले कुमारों को जन्म देनेवाली तीनों माताओं तथा जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों के तत्त्व को जाननेवाले गुरुजनों को साथ लिये, सदा धर्म का ही विचार करते रहनेवाले प्रभु (राम) के निकट हाथ जोड़े हुए आया।
सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा के भी आदिकारणभूत राम, यह कहते हुए कि 'मेरे पिता कहाँ हैं, बताइए'—वहाँ आई हुई उन माताओं के उज्ज्वल चरणों पर अपने अरुण नयनों से अश्रु बहाने लगे।
तब वे माताएँ राम को गले लगा-लगाकर रोने लगी। वहाँ एकत्र सेना के वीर एवं अप्सरा-समान स्त्रियाँ भी आग में पड़े मोम के जैसे पिघल उठीं।
फिर, राम आदि उन वीरों को जन्म देनेवाली वे माताएँ जनक की पुत्री का गाढ आलिंगन करके शोक-समुद्र में निमग्न हो गईं।
सेना के वीर, नगर के लोग, प्रेम से पीड़ित पूज्य, अन्य (स्त्री) जन, राजा लोग—सब दुःख से व्याकुल चित्त के साथ प्रभु (राम) के निकट आ पहुँचे।
शेष-शय्या पर शयन करनेवाले विष्णु ने जिस वंश को अपने अवतार का स्थान बनाया, उसके कुलपुरुष होने के कारण सूर्य भी, मानो अब (दशरथ की मृत्यु पर) स्वयं जल में स्नान करके तिलांजलि आदि देने का कर्त्तव्य पूर्ण करने जा रहा हो—यों सूर्य पश्चिमी समुद्र में निमग्न हुआ।
वह दिन बीत गया। दूसरे दिन जब राजा लोग, घनी जटा धारण किये मुनि लोग, वधुजन, अनुज-वर्ग (भरत आदि) सब एकत्र हुए, तब राम ने कहा—
हे भरत ! सबके अभीष्ट पूर्ण करनेवाले चक्रवर्ती मर गये। उनकी आज्ञा से सारी पृथ्वी तुम्हारी हुई है। तो तुमने किस कारण से मुकुट धारण किये बिना मुनि का वेष स्वीकार किया है ? कहो।
राम के यह कहने पर भरत, विकल मन के साथ उठे और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। अनेक क्षण तक प्रभु को देखकर फिर बोले—आपके अतिरिक्त धर्म-मार्ग पर स्थिर रहनेवाले और कौन हो सकते हैं ? ऐसे आप भी क्या धर्म से हट जाना चाहते हैं ?
२६२ | कम्ब रामायण
अनिष्ट उत्पन्न करनेवाले वरों को माँगकर जिस (कैकेयी) ने आपको, आपके लिए योग्य न होनेवाले इस अरण्य-वास में भेज दिया और चक्रवर्ती के लिए मृत्यु उत्पन्न की, उसी का तो पुत्र हूँ मैं। अतः, विचार करने पर, क्या यह वल्की-वेष मुझ-जैसे (पापी) के लिए उचित लगता है ?
संसार को दुःख देनेवाली पापिन का पुत्र होकर मैं उत्पन्न हुआ हूँ। मैंने अपने प्राण-त्याग देने का साहस नहीं किया। तपस्या करने योग्य भी नहीं रहा। अब इन अपयशों से किस प्रकार से मैं मुक्त हो सकूँगा ?
पातिव्रत्य से स्खलित स्त्रियों का शील, छूना-गुप से फिसले हुए तपस्वी का तप, कृपा से हीन हुआ धर्म—ये सब परंपरागत नीति से फिसले राजा के शासन से भी क्या गये-बीते हो सकते हैं ? नहीं (अर्थात् इन सबसे अधिक कठोर है नीति-रहित राजा का शासन)।
(चक्रवर्ती का ज्येष्ठ पुत्र होकर) संसार में उत्पन्न होकर भी आपने न त्यागने योग्य राजपद का त्यागकर बड़ा व्रत अपनाया है। तो क्या मैं भूल से भी, नीति से च्युत होकर, धर्म को करवाल से काटकर खाने के समान, वह राज्य स्वीकार करूँगा ?
(आपके प्रति) अपार प्रेम के कारण पिता मृत हुए। आप अति भयंकर धूप से पूर्ण वन में प्रविष्ट हुए। तो क्या मैं ऐसा शत्रु हूँ, जो षड्यंत्र करता हुआ, राज्य-हरण करने के लिए घात लगाये बैठा रहूँगा ?
हे हमारे प्रभु ! आपके पिता ने जो हानि की है तथा संसार को अति कठोर दुःख देनेवाली माता ने जो हानि की है—इन दोनों हानियों को दूर करते हुए आप अयोध्या वापस चलकर राज्य करें—यों भरत ने अपने मन के विचार प्रकट किये।
भरत के वचनों से उनके मन का निर्णय सुनकर रामचन्द्र ने सोचा—अहो ! इसका विचार कैसा है ! फिर बोले—हे विजयी वीर ! मेरा कथन सुनो और भली भाँति विचार करके ये वचन कहे—
हे तात ! सदाचार, सत्य, सबके लिए अनुसरणीय न्याय, उत्तम धर्म इत्यादि वंशों तथा शास्त्रों के अनुकूल चलनेवाले राजा के सुशासन में ही तो उत्पन्न होते हैं।
हे दृढ़ धनुर्धारी ! प्रशंसा के भाजन शास्त्रों का अध्ययन, दोषहीन ज्ञान, स्वार्थत्याग, उत्तम आचरण, ये सब वंदनीय गुरुजन ही हैं (अर्थात्, गुरुओं के कारण ही ये सब दृढ़ रहते हैं)।
हे प्यारे ! ये उत्तम गुरु कौन हैं ? यदि परिशुद्ध मन से विचार करके देखा जाय तो (विदित होगा कि) माता और पिता के अतिरिक्त अन्य (गुरु) कोई नहीं हैं।
शास्त्रों के ज्ञान से युक्त हे भाई ! माता ने वर माँगा। पिता ने भी आज्ञा दी। अपने उत्तम कुल की नीति के उपयुक्त कार्य ही मैंने किया। अब तुम्हारी प्रार्थना से इस कार्य को छोड़ना क्या उचित होगा ?
हे तात ! पुत्रों का कर्त्तव्य अपने कार्य से माता-पिता की कीर्त्ति को बढ़ाना होता है, या कभी न मिटनेवाला अपयश उत्पन्न करना होता है ?
अयोध्याकाण्ड २६३
क्या मेरे लिए यह उचित है कि पिता के वचन को भुलाकर वैभव तथा ऐश्वर्य- पूर्ण राजभोग का अनुभव करता हुआ शासन करूँ और उससे इस लोक में पिता को असत्य- वादी तथा परलोक में कठोर नरक-भोगी बना दूँ ?
‘पिता के दिये वर के अनुसार पृथ्वी का राज्य तुम्हारा है । तुम ( उस राज्य का निर्वाह करने योग्य ) शक्ति तथा सामर्थ्य से युक्त भी हो । अतः, राज्य तुम्हारा ही स्वत्व है, तुम राज्य करो’—राम ने जब यों कहा, तब भरत ने कहा—
यह पृथ्वी, जिसपर त्रिभुवन में भी अपनी समता न रखनेवाले आप मेरे ज्येष्ठ भ्राता बनकर अवतीर्ण हैं, यदि मेरी है, तो अब इसे मैंने आपको दिया। हे राजन् ! आप लौटकर मुकुट धारण करें ।
जब सारा संसार व्याकुल हो रहा है, तब स्तंभ-तुल्य भुजाओं से युक्त आपको क्या यह उचित है कि आप अपने मन के अनुसार कार्य करें ? अतः, संसार की व्याकुलता को शांत करते हुए लौट चलिए और ( संसार की ) रक्षा कीजिए, यों कहकर भरत ने रामचन्द्र के मनोहर चरणों को पकड़ लिया ।
तब राम ने भरत से कहा—मुझपर प्रेम होने के कारण यदि तुम संसार को मुझे सौंप दोगे, तो क्या वह न्याय-संगत होगा ? अपयश से डरकर पिता ने जो वर दिया, उसको मानकर जिस वनवास के लिए मैं आया हूँ, क्या ( अब राज्य स्वीकार करने से ) उस ( वनवास ) की अवधि पूरी हो जायगी ?
संसार में क्या सत्य के अतिरिक्त अन्य कोई पवित्र गुण है ? उस सत्य से दुर्गुण भी मिट जाते हैं, किन्तु सत्य से कुछ हानि नहीं होती है । तुम ठीक विचार कर देखो ।
पिता की आज्ञा के अनुसार मैं चौदह वर्ष वन में निवास करूँगा । तुम मेरी आज्ञा से इन चौदह वर्षों तक, सत्य से विचलित न होते हुए, पिता से दिये गये राज्य का पालन करो ।
चक्रवर्ती के जीवित रहते हुए भी यदि रत्नमय मुकुट को धारण करने के लिए मैं सहमत हुआ, तो वह पिता की आज्ञा का उल्लंघन न करने के लिए ही था । ( राज्य करने की इच्छा मुझे नहीं थी । ) मेरा उस प्रकार सहमत होने की बात जानकर भी तुम क्यों मेरी आज्ञा का पालन नहीं करना चाहते हो ? हे भ्राता ! दुःख को दूर करो । मेरे कथनानुसार कार्य करो । यों राम ने भरत से कहा ।
जब शोभा से पूर्ण रामचन्द्र ने ये वचन कहे, तब कुछ उत्तर देने के लिए उद्यत, समुद्र के समान गंभीर भरत को रोककर वसिष्ठ (राम से) बोले—हे उदारगुण ! तुम्हारे वंश में उत्पन्न कुछ प्राचीन राजाओं के आचरण के संबंध में तुम्हें सुनाता हूँ। उन्हें ध्यान से सुनो—
विष्णु ने पूर्वकाल में अनुपम वराह-रूप धारण करके, उमड़ते हुए समुद्र से अपने एकदंत के मध्य रखकर भूमि को यों उठाया कि वह बढ़ती हुई चंद्रकला के मध्य कलंक- जैसा दृश्य उपस्थित करने लगा।
पूर्व कल्प के अंत में, जब पंचमहाभूत अपने-अपने तत्त्वों में लीन हो गये, तब विष्णु, विस्तीर्ण जल को उत्पन्न करके उसपर ज्योति-रूप में निद्रित होने लगे ।
२६४ कंब रामायण
इस प्रकार (क्षीरसागर मे) शयन करते रहनेवाले, देवो को अमृत प्रदान करने-वाले समुद्र-जैसे नीलवर्ण विष्णु भगवान् की नाभि से एक शतदल (कमल) उत्पन्न हुआ, जिसमेंसे सारी सृष्टि करनेवाला ब्रह्मा उत्पन्न हुआ।
ब्रह्मा के द्वारा सृष्ट ससार की रक्षा के लिए तुम्हारे कुल का आदि पुरुष सूर्य उत्पन्न हुआ। उस सूर्य-कुल में अबतक कोई ऐसा राजा नही हुआ, जो न्याय से हटा हो। एक बात और सुनो।
हे मत्तगज-सदृश ! हित करनेवाले पाँच प्रकार के गुरुओ मे (अर्थात् माता, पिता, अध्यापक, राजा और ज्येष्ठ भ्राता इनमें) वही उत्तम गुरु होता है, जो इह और परलोक दोनो में सुख उत्पन्न करनेवाली शिक्षा प्रदान करता है (अर्थात्, आचार्य ही सर्वोत्तम गुरु हैं)।
(शास्त्रो मे) इसी प्रकार कहा गया है। मैने तुम्हे विविध विद्याएँ सिखाई हैं। अतः, हे तात ! इस समय मेरी आज्ञा का उल्लंघन मत करो। लौटकर राज्य का सुशासन करो—यो (वसिष्ठ ने) कहा।
यो कहनेवाले वसिष्ठ को अरुणनेत्र राम ने मुकुलित कमलों को शोभाहीन कर देनेवाली अपनी अंजलि से नमस्कार किया और कहा—हे मन पर दमन रखनेवाले ! हे ज्ञानी ! आपसे एक निवेदन है—
मधु बहानेवाले कमल पर आसीन ब्रह्मा के पुत्र ! चाहे कोई बड़े हों, गुरु हों। माता आदि हो, सत्य-परायण पुत्र हो, चाहे कोई भी हो, किसी के लिए भी मैं यह कार्य करूँगा—यो प्रतिज्ञा कर लेने पर उस प्रतिज्ञा को तोड़ना उचित नही है।
माता की आज्ञा को तथा पिता के द्वारा अनुमत कार्य को जो पुत्र पूर्ण नही करता है, उसके जैसा पापी बनकर रहने की अपेक्षा कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के ज्ञान से हीन श्वान बनकर सर्वत्र भटकते रहना अच्छा है।
पहले से ही माता-पिता की आज्ञा को मैने अपने शिर पर धारण कर लिया है। उसके पश्चात् अब आप दूसरी आज्ञा दे रहे हैं। हे महात्मन् ! अब मेरा कर्त्तव्य क्या है ? आप ही बतायें—यों राम ने वसिष्ठ से पूछा।
तब वसिष्ठ राम की प्रतिज्ञा के विरुद्ध कुछ नही कह सकने के कारण मौन हो रहें। उस समय भरत ने कहा—यदि ऐसी बात है, तो जो चाहे राज्य करे। मैं तो अपने ज्येष्ठ भाई के साथ ही इस भयंकर वन मे रहूँगा।
उस समय देवता लोग आकाश-पथ मे एकत्र होकर यह सोचने लगे कि यदि अब भरत रामचन्द्र को अयोध्या लौटा ले जायगा, तो हमारा कार्य पूर्ण नही होगा और फिर बोल उठे—
प्रशंसा के योग्य उत्तम गुणो से युक्त राम, पिता का वचन सुरक्षित करते हुए इस वन में रहे और भरत का कर्त्तव्य है कि वे चौदह वर्ष-पर्यंत, राज्य की रक्षा करें।
देवताओ के यो कहने पर राम ने भरत से कहा—यह वचन उपेक्षा करने योग्य नही है। मेरा भी तुम से यही आग्रह है। अब मेरी आज्ञा से तुम सुचारु रूप से पृथ्वी का
अयोध्याकाण्ड २६५
राज्य करो—यो कहकर राम ने भरत के विशाल कमल-जैसे करो को अपने हाथो मे ले लिया ।
तब भरत ने कहा—यदि ऐसा हो, तो हे प्रभु ! चौदह वर्ष व्यतीत होते ही यदि आप भयकर परिखा से घिरे अयोध्या-नगर में आकर पृथ्वी का शासन नही संभालेंगे, तो मै प्रज्वलित अग्नि मे प्रविष्ट होकर अपने प्राण त्याग दूँगा ।
इस प्रकार कहकर भरत चिंता से विमुक्त हुए । अपने यश से भी महान् स्वभाव-वाले राम ने उन ( भरत ) की मानसिक दृढता को देखकर प्रेम से द्रवित होते हुए चित्त के साथ कहा—‘वैसा ही करूँगा ।’
भरत अब और कुछ न कह सके । रामचन्द्र से वियुक्त होकर जाना उनके लिए कठिन था । उन्होने व्याकुल होकर राम से प्रार्थना की कि आप कृपा करके अपनी पादुकाएँ मुझे दे । प्रभु ने भी समस्त सुखो को प्रदान करनेवाली अपनी पादुकाएँ भरत को दी ।
अश्रु बहानेवाले नेत्रो तथा धरती की धूलि से धूसर शरीर से युक्त भरत ने ( प्रभु की ) दोनो पादुकाओ को किरीट मानकर अपने शिर पर रख लिया । फिर, धरती पर गिरकर रामचन्द्र के प्रति साष्टाग प्रणाम करके लौट चले ।
माताएँ, असख्य बंधुजन, बड़े लोग, मुनिगण, विशाल सेना तथा अन्य सब लोग भरत के साथ चले और यज्ञोपवीत से शोभायमान कंधेवाले वसिष्ठ महर्षि भी चले ।
प्राचीन शास्त्रो के ज्ञाता भरद्वाज महर्षि लौट चले । परिखा से आवृत अयोध्या के निवासी लौट चले । आकाश-पथ मे एकत्र हुए सभी देवता लौट गये । मेघ-सदृश राम की आज्ञा लेकर गुह भी लौट चला ।
भरत ( प्रभु की ) पादुकाओ को शिर पर रखे, शीतल जल से युक्त गंगा को पार करके, पुष्पों की सुरभि से भरी अयोध्या मे न जाकर रात्रिकाल में भी निद्रा से विहीन हो—
नंदिग्राम नामक स्थान मे ऐसे रहने लगे, मानो प्रभु की पादुकाएँ ही शासन करती रही हो । भरत, रात-दिन अश्रु-विहीन न होनेवाली आँखों के साथ, मन से पंचेन्द्रियो का दमन करके वहाँ रहने लगे ।
उधर रामचन्द्र, यह विचार कर कि अयोध्या के निवासी, उनके चित्रकूट पर्वत पर रहने से प्रेम के कारण, बार-बार वहाँ आयेंगे, इसलिए अपने साथी अनुज लक्ष्मण तथा अपनी देवी के साथ (चित्रकूट को छोड़कर) दक्षिण दिशा में चल पड़े । ( १-१४१ )
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कंब रामायण
अरण्यकाण्ड
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मंगलाचरण
आदि ब्रह्म भेद-रहित है तथा उत्पत्ति तथा विकारो से युक्त नाना प्रकार के रूपों ( वस्तुओ ) मे अनन्य होकर मिला रहता है । वह, उन वेदों के लिए, जो पुनः-पुनः उनका अध्ययन करते रहने से ज्ञान के यथार्थ स्वरूप को स्पष्ट करते हैं, एवं उन वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों और ब्रह्मादि देवताओं के लिए भी अज्ञेय है; वही परब्रह्म (अव रामचन्द्र के रूप में) हमारे ज्ञान का विषय हो गया है ।
<div align="center">●</div>अध्याय १
विराध-वध पटल
मनोहर वक्र धनुष को धारण करनेवाले वे राजकुमार ( राम-लक्ष्मण ), उन सीता देवी के साथ, जिनके दंत ऐसे थे, मानो चुनी हुई मुक्ताएँ पंक्तियों में जड़कर रखी गई हो, अपूर्व तपस्या से संपन्न अत्रि महामुनि के, पत्र-फल से परिपूर्ण घने वृक्षोंवाले वन मे जा पहुँचे ।
दिशाओ मे महान् भार का वहन किये हुए रहनेवाले, पीन और मनोहर सूँड़ो-वाले तथा छोटी आँखोवाले पर्वत-सदृश गजों की समता करनेवाले वे ( राम-लक्ष्मण ), उस वन मे प्रविष्ट हुए और काम आदि तीन दुर्गुणों को दूर करके तपस्या करनेवाले अतिपवित्र अत्रि मुनि को प्रणाम किया ।
वे मुनिवर ऐसे प्रसन्न हुए, जैसे अपने बन्धु ही आ गये हों और बोले—हे राजकुमारो ! तुम स्वयं यहाँ आकर हमें दर्शन दे रहे हो, ऐसे सौभाग्य सदा सुलभ नही होता । यह तो ऐसा है, मानो सब देवता तथा सभी लोक ही यहाँ आ गये हों । न जाने हम में से किसकी तपस्या का यह फल है ।
३०० | कंब रामायण
वे (राम-लक्ष्मण) उस दिन वहीं उस मुनि के साथ आश्रम में रहे। फिर, उन जानकी को, जिन्होंने उस मुनिवर की पवित्रता तथा अत्युत्तम पत्नी अनसूया की आज्ञा से सुन्दर आभूषणों, वस्त्रों एवं चन्दन को धारण किया था, साथ लेकर चले और महान् दंडकारण्य में प्रविष्ट हुए।
तब उनके सम्मुख एक राक्षस आया, जो चौदह नयनवाले, उनसे दुगुने विषैले, गोलाकार एवं कठोर नयनोंवाले पर्वतव्यापी चौदह हरणों को, अति तीक्ष्ण घोर त्रिशूल में घने रूप में पिरोकर एक हाथ में लिये हुए था।
उसके सिर पर रक्त वर्णवाले घुँघराले घने बाल थे, मानो विष ही घोर रूप धारण करके चन्दनवन से आ रहे हों। वह इस प्रकार शीघ्रगति से आया कि बड़े बड़ों से घिरे पर्वत भी उसके पैरों के नीचे दबकर धूल के समान हो गये।
ताले फल के समान (लाल) दिखाई पड़नेवाली उसकी आँखों से स्फुलिंग निकल रहे थे। उसके नेत्रों से विष आकाश की ओर उठता था; पर्वत हिल जाते थे; उष्णकिरण (सूर्य) मंद पड़ जाता था। विशाल समुद्र में घिरी अरती लहर नीचे ही रहती थी। अति बलवान् यम भी मन में (डर से) शिथिल हो उठता था।
उत्तप्त सिंह, उसके कानों में (उन्हें पर्वत की कंदरा समझकर) प्रवेश करके गरज रहे थे। चारों ओर कांति बिखेरनेवाले मेरु-शिखर उसके कुंडल बने हुए थे। उसने साथ युद्ध में मरे हुए वीरों के रक्त-रूपी रक्तचन्दन से लिप्त होकर वह रक्त-आकाश की नकल करता था।
उसने आयुधधारी वीरों, शीघ्रगामी अश्वों, अति विशाल गजों, रथों, गर्जनशील सिंहों, प्राणहारी व्याघ्रों तथा नागों ने प्राय अनेक जन्तुओं को मारकर, उजले ढाँचे में उन्हें गूँथकर अनेक प्रकार की मालाएँ बना ली थीं और वे (मालाएँ) उसकी भुजाओं में लटक रही थीं।
उसकी उँगलियों के मध्य ग्रंथियों में रखे हुए पर्वतों के समान क्रोध में गर्जन करनेवाले गज दबे पड़े थे; जिन्हें वह अपने विशाल कर से उठा-उठाकर अति विशाल विष-सदृश अपने मुँह में भर लेता था और (मुँह के) एक ओर से उन्हें चबा रहा था, तो भी उसकी भूख बढ़ती ही रहती थी।
उत्तम स्वर्ग के वनों से रत्नों को निकालकर जिस प्रकार माला बनाते हैं, उसी प्रकार अप्सराओं की देह में, देवताओं के विमानों, उज्ज्वल नक्षत्रों एवं नक्षत्रों की बीच-बीच में जड़कर उसने विजय-मालाएँ बनाई थीं और उन्हें अपने वक्ष पर धारण कर लिया था।
उसके पाँवों में रत्नाकार की समता करनेवाले केश शोभ रहे थे। उसके कुंभ-सदृश कंधे पर इन्द्र का ऐरावत बँधा हुआ था; जिसका मुखपृष्ठ तथा दांतों के फलक चमक रहे थे।
(उसमें) अत्यन्त घनी कालिमा संयुक्त थी। तीक्ष्ण अत्याचार उमड़ रहा था। अति निष्ठुर पाप, विष, अग्नि—ये सब भयंकर रूप से बढ़ रहे थे। अतः, वह ऐसा लगता था, मानो अंधकार से लिप्त कलिकाल ही साकार होकर आ रहा हो।
अरण्यकाण्ड ३०१
मारे हुए कठोर व्याघ्रो के चर्म को ऐंठकर उसे (उत्तरीय के रूप मे) पहन लिया था। हाथियों के चर्मों को कटि मे बाँध लिया था। विजयी दिग्गजों के रत्न-समुदाय को अजगर-रूपी रस्सी में पिरोकर कटि-बध के जैसे बाँध लिया था।
रक्त नयनों एवं दीर्घ देहवाले अनुपम सर्पों की मणियो को जड़कर अनेक वलय उसने अपने शरीर मे पहन लिये थे। उसके करो में 'चलांचल' नामक शब्दायमान शंखो के वलय चमक रहे थे।
उसके पैर ऐसे थे कि वह उन पैरो से कैलास और मेरु पर्वत को गेंद के समान उछालकर उन्हे परस्पर टकरा सकता था। ऐसे पैरो से गंभीर गति मे वह चल रहा था। यद्यपि वह भूलोक में संचरण कर रहा था, तथापि देवलोक के निवासियो के मन मे भी उसके बल का प्रभाव पड़ता था।
उसका आकार ऐसा था, मानो सब प्राणी एक रूप बनकर और नवीन आकृति धारण करके आ गये हो। उसकी कंठध्वनि वज्रघोष के समान थी। (उसकी तपस्या से) प्रसन्न हुए ब्रह्मा के द्वारा दिये गये वर के प्रभाव से वह सवा लाख हाथियो के बल से युक्त था।
महावज्र-सदृश कार्य करनेवाला विराध नामक वह राक्षस जब आ रहा था, तब (उसकी गति के वेग से) उसके दोनो पार्श्वों में वृक्ष उखड़-उखड़कर धराशायी हो रहे थे। बड़े पर्वत ढह जाते थे। यो वह उन धनुर्धारियो के सम्मुख आ पहुँचा, जिनको अपनी वीरता के योग्य युद्ध अभी तक प्राप्त नही हुआ था।
मास चबानेवाले लबे दाँतो, बलिष्ठ खड्ग-दंतो से चमकनेवाले अपने कंदरा-सदृश मुँह को खोलकर 'ठहरो, ठहरगे', चिल्लाता हुआ वह आया और घने दलवाले कमल पर आसीन रहनेवाली लक्ष्मी रूपी (राम की) देवी को, एक शब्द का उच्चारण करने के समय मे ही, झट उठाकर आकाश-मार्ग से जाने लगा।
वृषभ-सदृश वे दोनो वीर उसकी आकृति को देखकर क्रोध से उग्र हो उठे और कंधे पर के धनुष को वाम हस्त मे लेकर, उज्ज्वल तथा तीक्ष्ण नोकवाले बाण को दक्षिण कर में लेकर उस राक्षस का पीछा करते हुए बोले—अरे, इस प्रकार धोखा देकर कहाँ जा रहा है ? तब उस विराध ने (कहा—)
ब्रह्मा के द्वारा दिये गये वर के प्रभाव से मै मृत्यु-रहित हूँ। समस्त लोकों के निवासी भी यदि मेरा सामना करने आयें तो, मै किसी आयुध के बिना ही उन सब को जीत सकता हूँ। अरे ! मैने तुम्हारे प्राण छोड़ दिये हैं। इस स्त्री को छोड़कर सुख से चले जाओ, यो विराध ने कहा। तब—
वीर (राम) ने अपने रजत मदहास-रूपी ज्योत्स्ना को प्रकट करते हुए कहा—इस (राक्षस) ने युद्ध क्या है—यह जाना नही है। अब इसके प्रताप और बल सब मिट जायँगे—फिर, मन मे विचार करके अपने भारी धनुष का टकार किया।
वर्षाकालिक मेघ-सदृश रामचन्द्र ने, जो वज्र-सम वरछे एवं अपार पराक्रम से युक्त थे, अपने कोदण्ड की लबी डोरी से जो घोर टकार उत्पन्न किया, वह तरंगायमान समुद्रो से
३०२ | कंब रामायण
आवृत्त तथा भूधरों से भरित पृथ्वी में, पाताल में, स्वर्गलोक में तथा अन्य सब लोकों में वज्र-घोष के समान प्रतिध्वनित हो उठी।
तब वह राक्षस, वंचक तथा अत्याचारी मार्जार के मुँह में फँसे हुए तोते के समान चिल्लानेवाली सीता को छोड़कर किंचित् विकल-चित्त-सा खड़ा सोचता रहा। फिर, विक्षुब्ध होकर अंजनपर्वत-सदृश राम के सम्मुख आ खड़ा हुआ।
फिर, उसने अपने त्रिशूल को, जो शत्रुओं के रक्त में डूब-डूबकर पिशाचों की भूख को मिटाता रहता था और जो अपने तीनों नोकों से वडवाग्नि के सदृश ज्वालाएँ उगलता था, घुमाकर (रामचन्द्र पर) फेंका।
वह त्रिशूल हालाहल विष के समान उज्ज्वल हो अतिवेग से आने लगा, जिसे देखकर अष्ट दिशाएँ, दिक्पाल दिग्गज तथा सर्वलोक काँप उठे। तब राम ने महामेरु और सप्त कुलपर्वत-समान अति दृढ़ दीर्घ कोदंड में एक अपूर्व बाण रखकर प्रयुक्त किया।
आज से राक्षस-समूह का नाश हो गया—ऐसी सूचना देते हुए, दिन में ही मानों गगन से नक्षत्र गिर रहे हों—ऐसा दृश्य उपस्थित करते हुए चारों ओर प्रकाश फैलानेवाला वह शूल दो टुकड़े हो गया और दिशाओं के अंत में जा गिरा।
देवताओं का भी दमन करनेवाले उस शूल को टूटकर गिरते हुए देखकर भी उस राक्षस ने युद्ध करना छोड़ा नहीं। किन्तु, अधिक उत्साह दिखाता हुआ धरती को कँपा देनेवाले अपने हाथों से अनेक पर्वतों को जड़ से उखाड़कर त्वरित गति से वह (राम पर) फेंकने लगा।
रामचन्द्र ने अति दृढ़ तथा अति तीक्ष्ण बाणों को उन (पर्वतों) पर छोड़ा, जिससे घेरकर आनेवाले वे पर्वत टूटकर नीचे गिर गये। वह राक्षस एक-एक करके जो पर्वत फेंकता था, वे लौटकर उसी की देह पर गिरते थे, जिससे उसके शरीर में अनेक घाव हो गये।
तब उसने एक बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और उसको लेकर उस राम पर आक्रमण करने के लिए आया, जिनके नामों को ज्ञानी पुरुष जपते रहते हैं, जो धर्म को स्थापित करने के लिए सर्पशय्या को छोड़कर इस धरती पर अवतीर्ण हुए हैं। तब—
उत्तम वीर (राम) ने चार बाणों से उस बड़े वृक्ष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये और (राक्षस के) कंधों और वक्ष में बारी-बारी से अत्यन्त वेग से अनेक अति तीक्ष्ण बाण मारे, तब वह राक्षस—
अपने शरीर में अति पैने बाणों के छिद जाने से बहुत पीड़ित हुआ और त्वरित गति से अपने शरीर को झटकाकर उन बाणों को छितराने लगा, जैसे कोई बहुत बड़ा साही अपनी देह पर के काँटों को फुलाकर खड़ा हो।
तब राम ने और भी अग्नि-समान तीक्ष्ण बाणों को प्रयुक्त किया, जो कहीं भी रुके बिना (उसके शरीर को) भेद देते थे। फिर भी, उस (राक्षस) का चित्त पापमुक्त नहीं हुआ। पर्वत से गिरनेवाले निर्झर के समान उसके शरीर से रक्त बहने लगा। जिससे वह दुर्बल तथा मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।
अरण्यकाण्ड ३०३
वे दोनो (राम-लक्ष्मण), जो बिना थके हुए मल्लयुद्ध करने मे कुशल थे, यह सोचकर कि इस राक्षस को सत्य ही वर प्राप्त हुए हैं, जिससे यह शस्त्रो के प्रयोग से मर नही सकेगा, अत्यन्त क्रोध से करवाल निकालकर उसकी भुजाओ को काटने के विचार से उसके कंधो पर चढ़ गये।
बहनेवाले रक्त-प्रवाह से युक्त वह (विराध) पुनः संज्ञा पाकर उठा। जब उसको यह मालूम हुआ (कि राम-लक्ष्मण उसके कंधो पर चढ़ गये हैं) तब वह तुरन्त दंड-सदृश अपनी भुजाओं से उन दोनो को दबाकर अपनी पूर्व गति से भी दसगुने वेग से चल पड़ा।
तब वे दोनो मेरु की परिक्रमा करनेवाले सूर्य-चन्द्र के समान शोभायमान हो उठे। उस राक्षस का सिर गगन-तल से टकरा रहा था। वह अतिवेग से घूमने लगे और उसके शरीर से रक्त-प्रवाह बह चला।
स्वर्णवर्णवाले (लक्ष्मण) के साथ कृष्ण वर्णवाले (राम) को अपने कंधों पर लिये आकाश तक उठकर वह राक्षस चल पड़ा। तब वह उस पक्षिराज गरुड की समता करता था, जो धर्म-रूपी अपने पंखो पर बलराम और कृष्ण को उठाये वेग से जा रहा हो।
उत्तम कुल में उत्पन्न सीता, अति कृपालु अपने पति को वंचक राक्षस के द्वारा दूर उठा लिये जाते हुए देखकर अत्यन्त व्याकुल हुई और उस हंसिनी के समान हो गईं, जिसका जोड़ा (हंस) किसी के द्वारा बंदी बना लिया गया हो। वह मुरझाई हुई लता के समान अपने केशों को फैलाये धूल में गिर पड़ी।
फिर वह उठी। उनको संभालनेवाला व्यक्ति भी वहाँ कोई नही था। उन्हे सांत्वना का कोई शब्द भी नही मिला। वह शीघ्रता से (राक्षस का) पीछा करती हुई दौड़ी, जिससे उनकी विद्युत्-समान कटि काँप उठी। फिर, उस (राक्षस) से कहा—इन मातृ-समान करुणावाले धर्म-स्वरूप कुमारो को छोड़ दो और मुझको खा डालो।
वह रोई। उनका स्वर गद्गद हुआ। उनके प्राण विकल हुए। बड़ी वेदना से वह चित्र-लिखित प्रतिमा के समान स्तब्ध पड़ी रही। उनकी उस दशा को देखकर कनिष्ठ प्रभु (लक्ष्मण) ने कर जोड़कर (राम से) निवेदन किया—देवी अत्यन्त पीडित हो रही हैं। उनको इस दशा मे छोड़कर यो विनोद करना ठीक नही है। इससे अहित हो सकता है। तब सृष्टि के आदिभूत (भगवान् के अवतार राम) कहने लगे—
हे उपमाहीन! मैने सोचा, इस प्रकार ही सही, हम अपने गंतव्य स्थान को शीघ्र पहुँच जायेंगे। अब इसको मारना कोई बड़ा काम नही—यो कहकर मदहास करते हुए अपने बलिष्ठ पैर से उस राक्षस को धकेला। तब भी वह नीचे गिरा नही।
तब बलिष्ठ भुजावाले (राम-लक्ष्मण) ने क्रुद्ध होकर तीक्ष्ण करवालो से उसकी दोनो भुजाओ को काट डाला और धरती पर कूद पडे। तब वह राक्षस उन दोनो के निकट इस प्रकार झुक गया, जैसे रक्त नयनोवाला सर्प (राहु) भौंहो-रूपी भुजाओ को झुकाये, दोनो ज्योति-पिंडो (अर्थात्, सूर्य-चन्द्र) को ग्रसने के लिए आया हो।
उस (राक्षस) के घावो से अधिकाधिक रक्त बह रहा था। तो भी उसके प्राण
३०४ कंब रामायण
परलोक को नहीं जा रहे थे। उस दशा को देखकर सर्वान्तर्यामी (राम)ने विचारकर कहा— भाई ! इसे शीघ्र भूमि में गाड़ देना ही ठीक है।
मत्तगज-सदृश लक्ष्मण ने जो गढा खोदा, दोषहीन रामचन्द्र ने अपने उस रक्त चरण से विराध के शरीर को उसमें ढकेल दिया, जो (चरण) नर्मदा नदी में निमग्न हुआ था, जो पवित्र यज्ञों की आहुतियों को प्राप्त कर संसार के भक्तों को उनके अभीष्ट प्रदान करता था।
वह राक्षस, उस रामचन्द्र के प्रभाव से, जो ब्रह्मांड की सृष्टि करके स्वयं उस ब्रह्मांड में अवतीर्ण हुए थे, पूर्व-शाप से उत्पन्न दुःखदायक राक्षस-शरीर से मुक्त हो गया और गगन-तल में पूर्वज्ञान से युक्त होकर दिव्य देह धारण करके शोभायमान हुआ।
अब उस (दिव्य देहधारी) की बुद्धि, पंचेन्द्रियों के अधीन नहीं रह गई थी और वासनाओं से मुक्त हो सन्मार्ग पर स्थिर हो गई थी। उस (विराध) में पहले से ही अनन्य भक्ति विद्यमान थी। अतः, अब उसको तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया, जिससे प्रभु (राम) को पहचानकर वह उनकी स्तुति करने लगा।
सब वेदों के द्वारा स्तुत्य तुम्हारे चरण ही यदि सब लोकों में व्याप्त हैं, तो तुम्हारे अन्य अंग कैसे और कहाँ रहते होंगे। (कौन जाने ?) तुम शीतलता से युक्त समुद्र के निवासी हो, यदि तुम परस्पर असदृश पाँचों भूतों में निवास करने लगे, तो क्या वे (भूत) तुम्हें धारण करने में समर्थ हो सकेंगे ? (अर्थात्, नहीं होंगे)।
क्रुद्ध मगर से त्रस्त होने पर एक गज ने अत्यन्त आर्त्त हो शिथिल शरीर से, अपनी सूँड को ऊपर उठाकर सर्व दिशाओं में फैलनेवाली अपनी ऊँची ध्वनि से तुम्हें पुकारा था कि हे महिमापूर्ण, अनुपम, आदिकारण-भूत, हे परमतत्त्व आओ, मेरी रक्षा करो। उसी क्षण तुम 'क्या हुआ ?' कहते हुए दौड़कर वहाँ आ गये थे (और उस गज की रक्षा की थी)।
हे मेरे प्रभु ! तुम अपने (अर्थात्, परम पद में स्थित नित्य तथा मुक्त जीवात्मा) तथा बाह्य (अर्थात्, लोकों में वर्त्तमान भक्त आदि जीव)—इन दोनों को देखनेवाले हो, पक्षपातहीन हो, कृपा से कभी रहित न होनेवाले हो। हे कमल-सदृश नेत्रवाले। तुम धर्म की रक्षा के लिए, अन्य किसी की सहायता के बिना, एकाकी चक्र के समान घूमते रहते हो; यह तुम्हारा ही कार्य तो है।
जन्म और मरण इन दोनों खेलों को बड़ी उमंग के साथ करते रहनेवाले हे प्रभु ! तुम्हारी कृपा से सब प्रकार के जीवों को मुक्ति-पद प्राप्त करना कठिन नहीं है। विरक्ति को सर्वात्मना अपनाये हुए मुनि लोग यदि दूसरा जन्म ग्रहण भी करते हैं, तब भी वे अपने आत्मस्वरूप को नहीं भूलते। इतना ही नहीं, अन्य लोगों के समान (अर्थात्, जो विरक्त नहीं हैं, पुनः-पुनः जन्म भी नहीं पाते (अर्थात्, वे शीघ्र मुक्त हो जाते हैं)।
भयंकर जन्म-सागर के पार पहुँचने के लिए तरणि के समान रहनेवाले जितने धर्म हैं, उन सब धर्मों के अनुयायी जिस परमात्मा की प्रशंसा अनुपम और अवाङ्मनसगोचर कहकर करते हैं, तुम उसी परमात्मा के अवतार हो। अब तुम्हारे सम्मुख अन्य देवों की क्या गिनती है?
अररायकाण्ड ३०५
हे धर्म के अनुपम स्वरूप ! सृष्टिकर्त्ता कमलभव से लेकर सब देवो तथा उनमे इतर प्राणिवर्ग के लिए माता और पिता दोनो तुम्ही हो ।
आदि परब्रह्म तुम हो, सब लोक तुम्हारे अधीन हैं। विवेचन से परे अनेक धर्म तुम्हारे चरणो के ही आश्रित हैं। फिर, तुम बच्चक के सदृश क्यो छिपे रहते हो ? यदि तुम प्रकट हो जाओ, तो क्या हानि है ? क्या तुम्हारी यह अनन्त मायामय क्रीडा आवश्यक है ?
हे प्रभु ! तुम अज्ञेय होते हुए भी ( अपने दासो के लिए ) सुलभ-ज्ञेय भी हो। ससार मे ऐसा कोई वछड़ा नही होगा, जो अपनी माता को नही पहचानता हो । ऐसी माता भी नही होगी, जो अपने वछडे को नही पहचानती हो । अखिल सृष्टि की माता बने हुए तुम सबको पहचानते हो । किन्तु, वे सब तुम्हें यथार्थ रूप मे नही पहचानते । यह भी तुम्हारी कैसी माया है ?
संसार के लोग अनेक देवताओ की स्तुति करते हैं। किंतु महात्मा पुरुष तुम्हारे अतिरिक्त अन्य किसी को श्रेष्ठ नही मानते । सदाचार मे स्थिर रहनेवाले वे लोग क्या यह नही जानते कि ब्रह्मा आदि वेदज्ञो के द्वारा आराध्य देव तुम्हारे अतिरिक्त और कोई नही है ?
हे लक्ष्मी से अधिष्ठित सुन्दर वक्षवाले ! हे सदा जागरित रहनेवाले ! अनेक धर्मों के द्वारा आराध्य देवता भी कर्म के बधनो मे पड़े हुए लोगों के समान ही कठोर तपस्या करते रहते हैं। किंतु, तुम्हारे लिए करने योग्य कोई तपस्या नही है । अतएव कर्म-बधनो से मुक्त आत्माओं के सदृश तुम योगनिद्रा मे मग्न रहते हो ।१
तुम स्वयं आदिशेष का रूप धारण करके सुन्दर भूमिदेवी का वहन करते हो । ( वराह के रूप में ) अपने दाँत पर ( इस भूमि को ) धारण करते हो । ( प्रलय-काल मे ) एक ही बार ( एक ही कौर मे ) इस सृष्टि को निगल जाते हो । एक ही पग मे इस सारी पृथ्वी को ढक लेते हो । उस भूमि के प्रति तुम्हारे प्रेम को यदि सुगंधित तुलसी-हारो से अलंकृत तुम्हारे मनोहर वक्ष पर आसीन ( लक्ष्मी ) देवी जान लेंगी, तो क्या वह तुम से रूठ नही जायेंगी ?
हे प्रभु ! तुम्हारे द्वारा सृष्ट प्राणी यदि परम तत्त्व को किंचित् भी पहचान लेंगे और मुक्त हो जायेंगे, तो इससे तुम्हारी क्या हानि होगी ? स्वर्ग एवं इस धरती के निवासियो मे ऐसे लोग भी तो हैं, जो पूर्वकाल मे, तुमने शिवजी को जो भिक्षा दी थी, उस घटना को जानकर, सदेह से (अर्थात्, कौन परम-तत्त्व है, इस शंका से) मुक्त हो गये हैं।२
१. भाव यह है कि भगवान् विष्णु, कर्म-बधन में पडे प्राणियो के समान निद्रित नही हे, वह सजग हैं। किंतु, ऐसो योग-निद्रा में निरत हैं, जिससे अखिल विश्व की रक्षा होती है। २. भाव यह हे कि शिवजी ने एक बार ब्रह्मा के पाँच शिरो में एक को काट दिया, तो वह कपाल शिवजी के हाथ मे सट गया। बहुत कोशिश करने पर भी वह कपाल उनके हाथ से नहीं छूटा। तब आकाशवाणी हुई कि उसमें भीख माँगते रहो। जब वह कपाल भीख से भर जायगा, तब वह छूट जायगा। शिवजी सर्वत्र भीख माँगते रहे, कितु कपाल भरा नहीं। अंत में विष्णु भगवान् के पास पहुँचे। जब उन्होने भीख दी, तब कपाल एकदम भर गया और हाथ से छूट गया। इस घटना से यह सिद्ध होता है कि विष्णु शिवजी की भी रक्षा करनेवाले हे । —अनु०
| ३०६ | कंब रामायण |
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हे वराह-रूप मे पृथ्वी को उबारनेवाले ! तुमने हंस का आकार धारण करके अपूर्व शब्दो का उपदेश (ब्रह्मा को) दिया था। पहले तुम्हे उन वेदो को सिखानेवाले कौन थे ? वे सब क्या अब समाप्त हो गये हैं ? तुम (चर और अचर पदार्थों से) परे होकर अकेले रहते हो और सबके अतर्यामी हो। तुम्हारी यह स्थिति क्या इन पदार्थों से भिन्न हो रहने से संभव होती है या अभिन्न होकर रहने से ? यह कैसी माया है ?
हे उपमान-रहित ! हे एकनायक ! तुम अपने पूर्व विश्राम-स्थान क्षीरसागर को छोड़कर मेरे सुकृत से ही यहाँ आये हो। मै इस जीवन के सागर को पार कर गया। मै जन्म-हीन हो गया। तुमने अपने प्रवाल-समान चरण-युगल से मेरे कर्मद्वय को पोछ दिया।
विराध इस प्रकार के वचन कहकर देवरूप धारण कर खड़ा हुआ। तब विजय-शील (राम) ने कहा—तुम अपना वृत्तांत कहो।
तब विराध ने सारा वृत्तांत यो कह सुनाया—असत्य जीवन से मुक्ति देनेवाले, ज्ञान को प्रदान करनेवाले चरणो से युक्त, हे प्रभु ! तुम्हारी जय हो।
कठोर धनुष को हाथ में धारण करनेवाले हे देव ! मेरा नाम तुंबुर है। मै कुबेर के लोक का निवासी हूँ। अब मै इस धरती पर जन्म पाने का वृत्तांत कहता हूँ।
नर्त्तकी रंभा एक बार विशाल नृत्य-शाला मे गायन और नृत्य कर रही थी। (उसपर अनुरक्त रहने के कारण) मैं उसके ऊपर कुपित हुआ और (उसके डराने के लिए) राक्षस का रूप धारण कर लिया।
मेरी काम-वेदना मुझे आर्त करती हुई बढ़ने लगी। उस अपराध से (कुबेर ने) मुझे शाप दिया, जिससे मै राक्षस ही बना रहा।
हे आदि भगवन् ! उस यक्षराज (कुबेर) ने मुझे दुःख से मुक्ति पाने का वर देते हुए, मुझ दुःखी के प्रति कहा—जब मै तुम्हारे चरण का स्पर्श प्राप्त करूँगा, तब यह शाप मिट जायगा।
मै, भयंकर शूलधारी और विजयी किलिंज नामक राक्षस का पुत्र होकर उत्पन्न हुआ तथा इस विशाल लोक के सब प्राणियो को खानेवाला बना।
हे आदिब्रह्म ! अब मै, उस दिन से आजतक, भले-बुरे का विचार किये बिना (सब प्राणियो को) खाता हुआ पाप-कर्म करता रहा।
ज्ञान के प्रबोधक, अनादि वेदो के द्वारा प्रशंसित तुम्हारे स्वर्ण-वलय-भूषित चरण के स्पर्श से मै आज शाप-मुक्त हुआ।
हे सृष्टि के आदिकारण ! तुमने, प्राणियो की हत्या करने के कारण मेरे (संचित) पापो को मिटा दिया। ज्ञानहीन हो, मैने तुम्हारे प्रति जो अपराध किया, उसे क्षमा करो—यो प्रार्थना करके वह (विराध) वहाँ से चला गया।
देवो को सतानेवाला राक्षस मिट गया !—यो सोचकर आनन्दित हो, धनुर्विद्या मे निपुण राम-लक्ष्मण भी, कमलासना (लक्ष्मी के अवतार सीता) को साथ लिये हुए वहाँ से आगे बढ़े।
अरण्यकाण्ड ३०७
अपने करों में यम-सदृश धनुष को धारण करनेवाले वे वीर, सत्यमय वेद-स्वरूप मुनियों के निवास-स्थानभूत एक घने उद्यान में गये और दिन-भर वहीं रहे । ( १-७२ )
अध्याय २
शरभंग-देहत्याग पटल
जब रात्रि के आगमन का समय हुआ, तब 'कुरवक' तथा 'कोंगु' नामक पुष्पों से युक्त लता के सदृश सीता के साथ (राम-लक्ष्मण) उस स्थान से चलकर उस सुरभित स्थान में जा पहुँचे, जहाँ शरभंग मुनि तपस्या करते थे और जहाँ कुङ्कुमवृक्ष और कोंगु (नामक) वृक्ष लहलहाते थे ।
मनोहर शूल से युक्त वे वीर जब उस आश्रम में पहुँचे, तब देवेन्द्र वहाँ आया, जो रात्रि में भी मुकुलित न होनेवाले कमल-सदृश पृथक्-पृथक् शोभायमान सहस्र नयनों से युक्त था ।
उस (देवेन्द्र) की देह-कांति ऐसी थी, जैसे उसको घेरकर रहनेवाली लक्ष्मी-सदृश सुन्दर अप्सराओं के आभरणों की कांति तथा उस (कांति) पर फैली हुई विद्युत् की ज्वाला, दोनो मिलकर चमक रही हों ।
उसके काले वर्ण के शरीर पर के नेत्र-रूपी भ्रमर, दिव्य स्त्रियों के नयन-रूपी पुष्पित उद्यान में मत्त हो मँडरा रहे थे । उसके कर्ण-रूपी भ्रमर श्रीनारद की वीणा के नाद-रूपी मधु का पान कर रहे थे ।
उसने, शास्त्रों में प्रतिपादित अनेक कर्मों के समूह से युक्त एक सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे । उसके पैरों के वीर-वलयों पर, त्रिमूर्तियों के अतिरिक्त अन्य सब देवताओं के किरीट आकर लगते थे ।
वह इन्द्र विशाल रक्तकमल पर आसीन लक्ष्मी के समान रहनेवाली अपनी देवी (शची) के साथ, त्रिविध मदजलों से युक्त, आगे-आगे पैर उठा-उठाकर चलनेवाले, अति उष्ण श्वेत ऐरावत गज पर आरूढ होता था । वह उज्ज्वल रजतगिरि पर (पार्वती के संग) आसीन शिवजी की समता करता था ।
ऊपर का लोक (स्वर्ग) स्वयं श्वेत छत्र का रूप धारण कर उस (इन्द्र) के ऊपर यों छाया हुआ था कि उसे देखकर सर्वत्र फैलनेवाली कांति से युक्त शीतकिरण (चंद्रमा), यह सोचकर कि यदि अब मैं चमकता रहूँ तो उससे कुछ प्रयोजन नहीं है, मन्द हो रहा था ।
उसके (दोनो पाश्र्वों में) चामर उज्ज्वल कांति बिखेर रहे थे, जो (चामर) ऐसे थे, मानो असुरों की प्रभूत कीर्त्ति ही, दिग्गजों के स्वच्छ मदजलों का स्पर्श कर तथा उन गजों से अनेक युद्धों में टक्कर लेकर और उनमें परास्त हो घनीभूत बनकर वहाँ आ गये हों ।