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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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अरण्यकाण्ड ३०१

मारे हुए कठोर व्याघ्रो के चर्म को ऐंठकर उसे (उत्तरीय के रूप मे) पहन लिया था। हाथियों के चर्मों को कटि मे बाँध लिया था। विजयी दिग्गजों के रत्न-समुदाय को अजगर-रूपी रस्सी में पिरोकर कटि-बध के जैसे बाँध लिया था।

रक्त नयनों एवं दीर्घ देहवाले अनुपम सर्पों की मणियो को जड़कर अनेक वलय उसने अपने शरीर मे पहन लिये थे। उसके करो में 'चलांचल' नामक शब्दायमान शंखो के वलय चमक रहे थे।

उसके पैर ऐसे थे कि वह उन पैरो से कैलास और मेरु पर्वत को गेंद के समान उछालकर उन्हे परस्पर टकरा सकता था। ऐसे पैरो से गंभीर गति मे वह चल रहा था। यद्यपि वह भूलोक में संचरण कर रहा था, तथापि देवलोक के निवासियो के मन मे भी उसके बल का प्रभाव पड़ता था।

उसका आकार ऐसा था, मानो सब प्राणी एक रूप बनकर और नवीन आकृति धारण करके आ गये हो। उसकी कंठध्वनि वज्रघोष के समान थी। (उसकी तपस्या से) प्रसन्न हुए ब्रह्मा के द्वारा दिये गये वर के प्रभाव से वह सवा लाख हाथियो के बल से युक्त था।

महावज्र-सदृश कार्य करनेवाला विराध नामक वह राक्षस जब आ रहा था, तब (उसकी गति के वेग से) उसके दोनो पार्श्वों में वृक्ष उखड़-उखड़कर धराशायी हो रहे थे। बड़े पर्वत ढह जाते थे। यो वह उन धनुर्धारियो के सम्मुख आ पहुँचा, जिनको अपनी वीरता के योग्य युद्ध अभी तक प्राप्त नही हुआ था।

मास चबानेवाले लबे दाँतो, बलिष्ठ खड्ग-दंतो से चमकनेवाले अपने कंदरा-सदृश मुँह को खोलकर 'ठहरो, ठहरगे', चिल्लाता हुआ वह आया और घने दलवाले कमल पर आसीन रहनेवाली लक्ष्मी रूपी (राम की) देवी को, एक शब्द का उच्चारण करने के समय मे ही, झट उठाकर आकाश-मार्ग से जाने लगा।

वृषभ-सदृश वे दोनो वीर उसकी आकृति को देखकर क्रोध से उग्र हो उठे और कंधे पर के धनुष को वाम हस्त मे लेकर, उज्ज्वल तथा तीक्ष्ण नोकवाले बाण को दक्षिण कर में लेकर उस राक्षस का पीछा करते हुए बोले—अरे, इस प्रकार धोखा देकर कहाँ जा रहा है ? तब उस विराध ने (कहा—)

ब्रह्मा के द्वारा दिये गये वर के प्रभाव से मै मृत्यु-रहित हूँ। समस्त लोकों के निवासी भी यदि मेरा सामना करने आयें तो, मै किसी आयुध के बिना ही उन सब को जीत सकता हूँ। अरे ! मैने तुम्हारे प्राण छोड़ दिये हैं। इस स्त्री को छोड़कर सुख से चले जाओ, यो विराध ने कहा। तब—

वीर (राम) ने अपने रजत मदहास-रूपी ज्योत्स्ना को प्रकट करते हुए कहा—इस (राक्षस) ने युद्ध क्या है—यह जाना नही है। अब इसके प्रताप और बल सब मिट जायँगे—फिर, मन मे विचार करके अपने भारी धनुष का टकार किया।

वर्षाकालिक मेघ-सदृश रामचन्द्र ने, जो वज्र-सम वरछे एवं अपार पराक्रम से युक्त थे, अपने कोदण्ड की लबी डोरी से जो घोर टकार उत्पन्न किया, वह तरंगायमान समुद्रो से