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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 312

३०२ | कंब रामायण

आवृत्त तथा भूधरों से भरित पृथ्वी में, पाताल में, स्वर्गलोक में तथा अन्य सब लोकों में वज्र-घोष के समान प्रतिध्वनित हो उठी।

तब वह राक्षस, वंचक तथा अत्याचारी मार्जार के मुँह में फँसे हुए तोते के समान चिल्लानेवाली सीता को छोड़कर किंचित् विकल-चित्त-सा खड़ा सोचता रहा। फिर, विक्षुब्ध होकर अंजनपर्वत-सदृश राम के सम्मुख आ खड़ा हुआ।

फिर, उसने अपने त्रिशूल को, जो शत्रुओं के रक्त में डूब-डूबकर पिशाचों की भूख को मिटाता रहता था और जो अपने तीनों नोकों से वडवाग्नि के सदृश ज्वालाएँ उगलता था, घुमाकर (रामचन्द्र पर) फेंका।

वह त्रिशूल हालाहल विष के समान उज्ज्वल हो अतिवेग से आने लगा, जिसे देखकर अष्ट दिशाएँ, दिक्पाल दिग्गज तथा सर्वलोक काँप उठे। तब राम ने महामेरु और सप्त कुलपर्वत-समान अति दृढ़ दीर्घ कोदंड में एक अपूर्व बाण रखकर प्रयुक्त किया।

आज से राक्षस-समूह का नाश हो गया—ऐसी सूचना देते हुए, दिन में ही मानों गगन से नक्षत्र गिर रहे हों—ऐसा दृश्य उपस्थित करते हुए चारों ओर प्रकाश फैलानेवाला वह शूल दो टुकड़े हो गया और दिशाओं के अंत में जा गिरा।

देवताओं का भी दमन करनेवाले उस शूल को टूटकर गिरते हुए देखकर भी उस राक्षस ने युद्ध करना छोड़ा नहीं। किन्तु, अधिक उत्साह दिखाता हुआ धरती को कँपा देनेवाले अपने हाथों से अनेक पर्वतों को जड़ से उखाड़कर त्वरित गति से वह (राम पर) फेंकने लगा।

रामचन्द्र ने अति दृढ़ तथा अति तीक्ष्ण बाणों को उन (पर्वतों) पर छोड़ा, जिससे घेरकर आनेवाले वे पर्वत टूटकर नीचे गिर गये। वह राक्षस एक-एक करके जो पर्वत फेंकता था, वे लौटकर उसी की देह पर गिरते थे, जिससे उसके शरीर में अनेक घाव हो गये।

तब उसने एक बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और उसको लेकर उस राम पर आक्रमण करने के लिए आया, जिनके नामों को ज्ञानी पुरुष जपते रहते हैं, जो धर्म को स्थापित करने के लिए सर्पशय्या को छोड़कर इस धरती पर अवतीर्ण हुए हैं। तब—

उत्तम वीर (राम) ने चार बाणों से उस बड़े वृक्ष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये और (राक्षस के) कंधों और वक्ष में बारी-बारी से अत्यन्त वेग से अनेक अति तीक्ष्ण बाण मारे, तब वह राक्षस—

अपने शरीर में अति पैने बाणों के छिद जाने से बहुत पीड़ित हुआ और त्वरित गति से अपने शरीर को झटकाकर उन बाणों को छितराने लगा, जैसे कोई बहुत बड़ा साही अपनी देह पर के काँटों को फुलाकर खड़ा हो।

तब राम ने और भी अग्नि-समान तीक्ष्ण बाणों को प्रयुक्त किया, जो कहीं भी रुके बिना (उसके शरीर को) भेद देते थे। फिर भी, उस (राक्षस) का चित्त पापमुक्त नहीं हुआ। पर्वत से गिरनेवाले निर्झर के समान उसके शरीर से रक्त बहने लगा। जिससे वह दुर्बल तथा मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।