कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 313, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ३०३
वे दोनो (राम-लक्ष्मण), जो बिना थके हुए मल्लयुद्ध करने मे कुशल थे, यह सोचकर कि इस राक्षस को सत्य ही वर प्राप्त हुए हैं, जिससे यह शस्त्रो के प्रयोग से मर नही सकेगा, अत्यन्त क्रोध से करवाल निकालकर उसकी भुजाओ को काटने के विचार से उसके कंधो पर चढ़ गये।
बहनेवाले रक्त-प्रवाह से युक्त वह (विराध) पुनः संज्ञा पाकर उठा। जब उसको यह मालूम हुआ (कि राम-लक्ष्मण उसके कंधो पर चढ़ गये हैं) तब वह तुरन्त दंड-सदृश अपनी भुजाओं से उन दोनो को दबाकर अपनी पूर्व गति से भी दसगुने वेग से चल पड़ा।
तब वे दोनो मेरु की परिक्रमा करनेवाले सूर्य-चन्द्र के समान शोभायमान हो उठे। उस राक्षस का सिर गगन-तल से टकरा रहा था। वह अतिवेग से घूमने लगे और उसके शरीर से रक्त-प्रवाह बह चला।
स्वर्णवर्णवाले (लक्ष्मण) के साथ कृष्ण वर्णवाले (राम) को अपने कंधों पर लिये आकाश तक उठकर वह राक्षस चल पड़ा। तब वह उस पक्षिराज गरुड की समता करता था, जो धर्म-रूपी अपने पंखो पर बलराम और कृष्ण को उठाये वेग से जा रहा हो।
उत्तम कुल में उत्पन्न सीता, अति कृपालु अपने पति को वंचक राक्षस के द्वारा दूर उठा लिये जाते हुए देखकर अत्यन्त व्याकुल हुई और उस हंसिनी के समान हो गईं, जिसका जोड़ा (हंस) किसी के द्वारा बंदी बना लिया गया हो। वह मुरझाई हुई लता के समान अपने केशों को फैलाये धूल में गिर पड़ी।
फिर वह उठी। उनको संभालनेवाला व्यक्ति भी वहाँ कोई नही था। उन्हे सांत्वना का कोई शब्द भी नही मिला। वह शीघ्रता से (राक्षस का) पीछा करती हुई दौड़ी, जिससे उनकी विद्युत्-समान कटि काँप उठी। फिर, उस (राक्षस) से कहा—इन मातृ-समान करुणावाले धर्म-स्वरूप कुमारो को छोड़ दो और मुझको खा डालो।
वह रोई। उनका स्वर गद्गद हुआ। उनके प्राण विकल हुए। बड़ी वेदना से वह चित्र-लिखित प्रतिमा के समान स्तब्ध पड़ी रही। उनकी उस दशा को देखकर कनिष्ठ प्रभु (लक्ष्मण) ने कर जोड़कर (राम से) निवेदन किया—देवी अत्यन्त पीडित हो रही हैं। उनको इस दशा मे छोड़कर यो विनोद करना ठीक नही है। इससे अहित हो सकता है। तब सृष्टि के आदिभूत (भगवान् के अवतार राम) कहने लगे—
हे उपमाहीन! मैने सोचा, इस प्रकार ही सही, हम अपने गंतव्य स्थान को शीघ्र पहुँच जायेंगे। अब इसको मारना कोई बड़ा काम नही—यो कहकर मदहास करते हुए अपने बलिष्ठ पैर से उस राक्षस को धकेला। तब भी वह नीचे गिरा नही।
तब बलिष्ठ भुजावाले (राम-लक्ष्मण) ने क्रुद्ध होकर तीक्ष्ण करवालो से उसकी दोनो भुजाओ को काट डाला और धरती पर कूद पडे। तब वह राक्षस उन दोनो के निकट इस प्रकार झुक गया, जैसे रक्त नयनोवाला सर्प (राहु) भौंहो-रूपी भुजाओ को झुकाये, दोनो ज्योति-पिंडो (अर्थात्, सूर्य-चन्द्र) को ग्रसने के लिए आया हो।
उस (राक्षस) के घावो से अधिकाधिक रक्त बह रहा था। तो भी उसके प्राण